भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 208

प्रथमः निष्यन्दः १०७ धर्म, शुद्धाचरणा, शाश्वतिक मूल्य, पुनर्जन्म, कर्म फलों के भोग, स्वर्ग, तप, संयम नैतिकता आदि के लिए कोई स्थान नहीं है। इसका लक्ष्य मात्र एक है— १. ऐन्द्रियसुखोपभोग २. भौतिक सुख-समृद्धि । २. 'यावज्जीवेत सुखं जीवेत्' तक तो ठीक है किन्तु 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्'— समाज का आदर्श नहीं बन सकता। ३. चावल, महुआ, अंगूर आदि को सड़ाकर आसवन प्रक्रिया से जो शराब बनती है उसका मत्तकारी प्रभाव क्षणिक होता है किन्तु चेतना (चैतन्य) को भी शराब के नशे के समान कहना ठीक नहीं है—आत्मा या चैतन्य क्षणस्थायी नशा नहीं है प्रत्युत् प्रत्येक प्राणी का सार्वकालिक, सार्वदेशिक एवं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। यही उसकी चेतना—प्रत्यभिज्ञा एवं अस्तित्त्व है। कारिकाकार का कथन है कि—'मैं सुखी हूँ—मैं दुःखी हूँ, मैं अनुरक्त हूँ'—इस प्रकार के दूसरे विकल्पज्ञान—शरीर आदि से भिन्न—किसी दूसरी की वेदक सत्ता के साथ ही सम्बद्ध है और वह वेदक सत्ता (आत्मा) स्वयमेव इन सभी से पूर्णतया भिन्न होने पर भी इन सभी में अनुस्यूत है। 'अन्यत्र' पद उस स्वभाव का द्योतक है जो स्वयं समस्त अवस्थाओं से भिन्न है— 'स स्वभावः परः स्मृतः ।' यही है आत्मा ॥ निष्कर्ष-रामकण्ठाचार्य—'स्वयंसिद्ध, नित्यनिरावरणरूप, सर्वत्र अनिरुद्ध एवं तात्त्विक स्वस्वभाव शङ्कर ही वह आत्मा एवं स्वस्वभाव है और समस्त अवस्थाओं से पृथक् होते हुए भी सारी अवस्थाओं में से ही अनुस्यूत है। उत्पलदेवाचार्य के मतानुसार यद्यपि आत्मा के दो भेद हैं—१. मित २. अपरिमित 'द्विधा स एष एवात्मा मितोऽपरिमितस्तथा' १. (अणु) २. परमात्मा। किन्तु इनमें भी स्वभावतः ऐक्य है। पारमार्थिक तत्त्व का स्वरूप न दुखं न सुखं यत्र न ग्राह्यं ग्राहकं न च । न चास्ति मूढभावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥ ५ ॥ जहाँ (जिस स्पन्द तत्त्व में) न दुःख है, न सुख है, न ग्राह्य है और न तो ग्राहक (का भाव) है तथा जहाँ मूढ़भाव (अज्ञान, वेद्य-विमर्श की क्षमता का अभाव) भी नहीं है वही स्पन्दतत्त्व परमार्थतः सत् है ॥ ५ ॥

  • सरोजिनी * सुख-दुःख, मोह आदि त्रिगुणात्मक अन्तःकरण के विषय हैं न कि स्पन्दतत्त्व के। संवित् भट्टारिका सूक्ष्म प्राण बनने के अनन्तर अन्तःकरण का रूप धारण करती है। अन्तःकरण ही सुखादिक के आश्रय है। शङ्कर के रूप में स्थित स्पन्द तत्त्व का यहाँ निषेधपरक विवेचन किया गया है। ग्राह्यं = आन्तरग्राह्य । बाह्य ग्राह्य । प्रमेय (Perceptible)