स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ स्पन्दकारिका विरोधाभास, निःशेष द्वैत, समस्त द्वन्द्व जाल, सारे भेद, विशुद्धचिद्रूप एकाकारता में (संसार में विलीन अनन्त सरिताओं की भाँति) अवस्थित रहती है । ख) अशुद्ध अहं विमर्श—माया शक्ति के कारण संकुचित (मित) अहं प्रतीति । इसका सम्बन्ध पशुप्रमाता के साथ है । इस स्तर पर विशुद्ध चित्त तत्त्व अपनी रूपान्तरित माया शक्ति के द्वारा अपनी अभिन्न शक्ति—ज्ञान शक्ति, क्रिया शक्ति एवं माया शक्ति को संकोच भाव में तिरोहित करके गुणत्रय के समष्टिरूप अन्तःकरण के स्वरूप को धारण कर लेता है । यह चित्त ही विभिन्न उपाधियों, अवस्थाओं, शरीरों द्वन्द्वों एवं भेदों को धारण करके एकता से अनेकता को ग्रहण करके उन स्वकल्पित एवं स्वारोपित (अ- यथार्थ) स्वरूपों को आत्मसत्ता से अभिन्न मानकर अहं रूप में स्वीकार करता रहता है । 'इदं' को अहं मानकर चलता है । ज्ञानोदय के अनन्तर वह घट, पट, नील, सुख, दुखादि 'इदं' को अहं से पृथक् मानकर 'इदं' मानकर तथा अपनी सत्ता को 'अहं' मानकर तथा अपने को विशुद्ध आत्मस्वरूप से अभिन्न समझकर चलता है । 'न चास्ति मूढ़भावोऽस्ति'—मूढ़ता है क्या? 'मूढ़स्य भावो मूढ़त्व वेद्यवेदन सामर्थ्याभावः ।' (स्पन्दकारिका)। 'मूढ़ता' = (गंभीरसंवेदनहीनता) ॥ प्रश्न यह उठता है कि आत्मस्वरूप में सुख दुःखादि संवेदनाओं का नितान्त अभाव (संवेदनहीनता वेद्य पदार्थों की अनुभूति का नितान्त अभाव) है तो क्या उसमें मूढ़भाव है? क्या वह प्रस्तर के समान समस्त संवेदनाओं की शक्ति से हीन है? स्पन्द शास्त्र में ही इसका उत्तर दिया गया है—'यतः तस्यापि अवस्थान्तरे मूढोऽहमासम् इति प्रत्यवमर्शनमानत्वात् वेद्यत्वं स्थितमेव केवलं तत्कालमनुपलंभः ॥ (स्प० का०)' कोई व्यक्ति संज्ञाहीन हो या प्रगाढ़ सुषुप्ति में लीन हो लेकिन सामान्य जागृता- वस्था या संज्ञा में आने पर वह कहता है कि 'मैं गहरी निद्रा में या गंभीर संवेदनहीन अवस्था में अवस्थित था किन्तु पत्थर ऐसा कभी नहीं कहता । अतः मूढ़ता भी आत्मा का स्वभाव नहीं है । यदि आत्मा उस समय मूढ़ रही होती तो उसको उसका बाद में भान कैसे होता ? 'तदस्ति परमार्थतः'—वही पारमार्थिक सत्य है—वही परमार्थतः यथार्थ है । आत्मतत्त्व की परमार्थ सत्ता—सूत्रकार की दृष्टि में समस्त उपाधियों से शून्य, विशुद्ध आत्मस्वरूप पदार्थ ही परमार्थसत् है और उससे पृथक् समस्त कार्य प्रपञ्च सांवृत्तिक सत् है । पारमार्थिक सत् नहीं । जो वस्तु परमार्थतः सत है वह कभी असत् सिद्ध नहीं की जा सकती । यदि उसे असत् मान लिया जाय तो असत् से सत् की उत्पत्ति कैसे होगी? स्पन्द तत्त्व सत् है और उससे कार्यरूप सत् का विकास होता है । १. माध्यमिक शून्यवादियों ने शून्य को सत्य (परमार्थ सत्) कहा । २. विज्ञानावादियों ने विज्ञान को सत्य कहा । अभाववादी प्राचीन वेदान्तियों ने परम सत्य को अभावस्वरूप माना । गौड़पादाचार्य परमार्थ का स्वरूप इस प्रकार उल्लिखित करते हैं—