स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ स्पन्दकारिका निरूपण किया गया है—'मूढ़' = माया के वशीभूत होकर जडाभासीभूत अणु । मूढत्व = अचेतनत्व ॥ यतः = जिसके द्वारा । (यस्मात् स्पन्दतत्त्वात्) । करणवर्गो— इन्द्रियग्राम । इन्द्रियों का समूह । बाह्य इन्द्रियसमूह । अयं = यह । (यह इन्द्रिय समूह) । विमूढ = चैतन्य शून्य । विशेष रूप से चैतन्य विवर्जित । सहान्तरेण चक्रेण = देवियों की इन्द्रियों के साथ । (न कि आन्तरिक इन्द्रियाँ) इसका अर्थ पुर्यष्टक भी नहीं है । इसका अर्थ इन्द्रियाधिष्ठान भी नहीं है । चक्रेण = आन्तर वृत्त के साथ । प्रयत्न = उद्योगरूप उत्साह (उत्पल०) । संहृतीः = संहार । आदरः = श्रद्धाः 'अतः सततमुद्युक्तः' भी कहा गया है । परीक्ष्यं = परीक्षण का विषय बनाया जाना चाहिए । तत्त्व = स्पन्दात्मक संवित्स्वभाव, स्वस्वभाव, । स्वतन्त्रता = कर्तुं, अकर्तुं, अन्यथा कर्तुं की अघटन घटनापटीयसी शांभवी नित्य शक्ति जो शिव की स्वसमवेता शक्ति या आत्मधर्म है । अकृत्रिमा = सहज । स्वाभाविक । पूर्व प्रतिपादित सिद्धान्त श्रद्धा एवं उद्योगपूर्वक परीक्षित किया जाना चाहिये ॥ अर्थात्—वह तत्त्व अत्यन्त सावधानी एवं अत्यन्त प्रयासपूर्वक परीक्षित किया जाना चाहिए । इसके द्वारा करणग्राम अचेतन (विमूढ़) होते हुए भी आन्तर चक्रों के साथ चेतनवत् क्रिया करते हैं और वे सृष्टि-स्थिति-संहार के साथ प्रवृत्त होते हैं । पूर्व श्लोकों में प्रतिपादित स्पन्द सिद्धान्त एवं परमतत्त्व का परीक्षण श्रद्धा एवं अध्यवसाय पूर्वक इसलिए किया जाना चाहिए क्योंकि इसके द्वारा करणवर्ग (इन्द्रियग्राम) अचेतन होकर भी चेतनवत् क्रिया करता है और यह स्पन्द तत्त्व समस्त भेदों के संहार के रूपों वाला है । 'उद्यमो भैरवः' (शिवसूत्र) कहकर शिवसूत्रकार ने इसी तथ्य को संकेतित किया है । यह भैरव के भैरव रूप का उद्यम है । यह अकृत्रिमा, स्वस्वभावा स्वातन्त्र्य शक्ति में अभिव्यक्त है । शङ्कर की आत्मस्वरूपा यह संवित् जो कि स्वस्वभावा, अकृत्रिमा, सहजा, स्पन्दतत्त्वरूपा एवं स्वातन्त्र्यसम्पन्ना है जड़ एवं चेतन सभी में स्फुरित हो रही है । भगवान् स्वातन्त्र्य शक्ति समवेत हैं— 'स्वतन्त्रः परिपूर्णोऽयं भगवान्भैरवो विभुः । तत्रास्ति यन्न विमले भासयेत्स्वात्मदर्पणे ॥ (परात्रिंशिका वि० = अभिनवगुप्त) ॥ 'स्वातन्त्र्य' है क्या ? अभिनवगुप्त कहते हैं—'परमेश्वरस्य स्वात्मनि इच्छात्मिका स्वातन्त्र्यशक्तिः ।।' (परात्रिंशिका विवृति) ॥ इस श्लोक में 'अन्तरेण चक्रेण' का अर्थ विचारणीय है । १. इसका अर्थ है—आन्तरिक इन्द्रियाँ नहीं है क्योंकि इन्द्रियों का उल्लेख तो 'करणवर्ग' में हो चुका है । २. इसका अर्थ—'पुर्यष्टक' भी नहीं हो सकता क्योंकि आन्तरिक इन्द्रियों ऊपर करणवर्ग से सम्बद्ध दिखाई गई हैं । ३. इसका अर्थ—इन्द्रिय-विषय भी नहीं हो सकता क्योंकि वे योगहीन लोगों के