स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ स्पन्दकारिका (क) 'करणवर्ग'—करण साधन है । 'साधकतमं करणम्' । वह साधन जो किसी कार्य के निष्पादन में सर्वाधिक उपयोगी एवं आवश्यक साधन हो उसे 'करण' कहते हैं । करणों का समूह निम्नांकित है— १) अन्तःकरण—४ = १. मन २. बुद्धि ३. चित्त ४. अहंकार । १. मन २. बुद्धि ३. अहंकार । २) बाह्यकरण—क) पञ्च कर्मेन्द्रियाँ—१. पैर २. हाथ ३. जिह्वा ४. पायु और ५. उपस्थ । (ख) पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ—१. कर्ण २. त्वचा ३. नेत्र ४. रसना ५. नासिका । ये सारे करण अचेन (मूढ़) हैं । विशेष स्पन्दों के प्रवाह ही इनमें क्रिया निष्पादन की क्षमता प्रदान करते हैं अन्यथा स्वतः तो ये अचेतन होने के कारण निष्क्रिय हैं । मृत्यूपरान्त एवं विकारग्रस्त होने पर या चैतन्य का संपर्क टूट जाने पर ये कोई कार्य निष्पादित नहीं कर पाते । (ग) 'आन्तरचक्र'—प्रथम कारिका (प्रथम स्पन्द सूत्र) में भी चक्र का उल्लेख हुआ है—'तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ।' पारमेश्वरी शक्ति के विविध प्रवाह निम्नांकित हैं— १. मातृका (शब्द समूह) का रूप धारण करके अ से क्ष पर्यन्त आठ वर्गों की अधिष्ठात्रियाँ बनी हुई हैं जो निम्न है—क) 'माहेश्वरी' ख) 'ब्राह्मणी' ग) 'कौमारी' घ) 'वैष्णवी' ङ) 'ऐन्द्री' च) 'याम्या' छ) 'चामुण्डा' ज) 'योगीशी' । २. अन्तःकरणों एवं बहिष्करणों का स्वरूप धारण करके समस्त शारीरिक एवं मानसिक कार्यों का निष्पादन करते हैं जो निम्न है—क) खेचरी ख) भूचरी ग) दिक्चरी घ) गोचरी शक्ति । ३. प्राण, बुद्धि, अन्तःकरण, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, पञ्चमहाभूत । विरंचि से तृण पर्यन्त समस्त सत्ताएँ परमात्मा की अनन्त शक्तियों के अनन्त रूप ही तो हैं । इन्हीं अनन्त शक्तियों का अभिधान है—'शक्तिचक्र' । 'तदेव शक्तिभेदेन माहेश्वर्यादि चाष्टकम् । माहेश्वरी ब्राह्मणी चैव कौमारी वैष्णवी तथा ॥ ऐन्द्री याम्या च चामुण्डा योगीशी चेति ता मताः ॥' (मा०वि० ३.१३-१४) 'प्रत्यभिज्ञाहृदय' के बारहवें सूत्र में क्षेमराज ने भी इनका उल्लेख किया है— 'किञ्चितिरेव भगवती विश्व वमनात् संसारवामाचारत्वाच्च वामेश्वर्याख्या सती, खेचरी- गोचरी-दिक्चरी-भूचरी रूपै, अशेषैः प्रमातृ अन्तःकरण बहिष्करण भावस्वभावैः परिस्फुरन्ती— क) पशुभूमिकायां शून्यपदविश्रान्ता किञ्चित्कर्तृत्वाद्यात्मक कलादिशक्त्यात्मना खेचरी क्रमेण ।