स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ स्पन्दकारिका स्वस्वभाव में स्थित होकर करणवर्ग को स्वविषयों में प्रवृत्त कराने में स्वतन्त्र है। अतः वह तत्सम है। यथा ईश्वर सर्व व्यापिका ज्ञान क्रिया आदि शक्तियों से विश्व को प्रवृत्त करके सभी कुछ जानता है एवं सभी कुछ करता है उसी प्रकार पुरुष उसकी शक्ति के संस्पर्श से ज्ञातृत्व-कर्तृत्व की सामर्थ्य प्राप्त करके (माया के कारण) निश्चित विषयों द्वारा और ज्ञान-क्रिया शक्तियों द्वारा अंतरवर्ती एवं बाह्यवर्ती करणों द्वारा प्रसृत स्वविषयों को जानता भी है और संपादित भी करता है। यही है दोनों में—पुरुष एवं परमात्मा में— साम्य ॥ इसीलिए कहा गया है—'न च इच्छाप्रेरणेन करणानि प्रेरयति।' संसारी पुरुष करणवर्ग को अपने-अपने व्यापार में प्रवर्तित करते हुए ईश्वरभूमिका प्राप्त करने के कारण परमात्मा की ही भाँति स्वातन्त्र्य प्राप्त कर लेता है। अतः संसारी पुरुष एवं ईश्वर में अभेद सिद्ध है। १ आचार्य उत्पल इस कारिका के प्रतिपाद्य विषय के विषय में कहते है— 'तदिच्छायास्तु सामर्थ्यं करणानां स्वतन्त्रता। सर्वत्रोक्तास्य या सा तु भक्तियुक्तिरतस्त्वियम् ॥' २ यह बात कैसे हो गई कि उस तत्त्व से चैतन्य सदृश शक्ति प्राप्त करके इन्द्रियाँ स्वयमेव प्रवृत्त्यादि शक्तियाँ प्राप्त कर लेती हैं? यही ग्राहक—कारणों को प्रेरित करता है। तत्त्व की प्रयत्नपूर्वक परीक्षा की जानी चाहिए यह कैसे ? क्योंकि अपनी इच्छा बाहर ही अनुधावन करती रहती है न कि तत्त्व-परीक्षा में। ऐसी आशंका होने पर ही ग्रन्थकार कहते हैं— 'नहीच्छानोदनस्यायं .... पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥' ३ अर्थात् सांसारिक प्राणी इच्छा के संचालक के रूप में अर्थात् संचालक या निर्देशक की भाँति क्रिया नहीं किया करता प्रत्युत् वह अपनी आत्मशक्ति (Vitality of self) की प्रेरणा से उस (तत्त्व) के समान हो सकता है। ४ सांसारिक प्राणी इच्छाओं का अंकुश या संचालक बनकर कोई कार्य नहीं करता, वह इच्छाओं के अभिप्रेरण (नोदन) का सूत्रधार नहीं है अर्थात् वह इन्द्रियों को अपने विषयों की ओर प्रवृत्त करने में संचालक की भूमिका का निर्वहन नहीं करता प्रत्युत् वह उस स्पन्दशक्ति की किञ्चिन्मात्र प्रेरणा से उस तत्त्व के तुल्य हो सकता है जो कि चेतना से अभिन्न आत्मा की शक्ति को जन्म देता है। यहाँ तक कि जड़ भी चेतन हो सकते हैं जब कि वे अहंता के अमृत की एक बूँद से अभिषिक्त हो जायें। तत् से वह तत्त्व स्पन्दन करने में केवल इन्द्रियों को ही नहीं प्रत्युत् कृत्रिम प्रमाता (Perceiver) को भी सक्षम बनाता है और शंका की जाती है कि वह चेतना को प्रेरित करके इन्द्रियों का १. स्पन्दकारिका विवृति। २. स्पन्दप्रदीपिका। ३-४. स्पन्दनिर्णय।