भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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२४ स्पन्दकारिका (१) त्र्यम्बक उसी अद्वैतवादी परम्परा के प्रवर्तक श्रीकण्ठ के पुत्र हैं। (२) आमर्दक द्वैतवादी परम्परा के प्रवर्तक थे। (३) श्रीनाथ नामक आचार्य द्वैताद्वैत परम्परा के प्रवर्तक थे। (४) त्र्यम्बक से चलने वाली परम्परा को ही इस पद्य में त्रैयम्बक सन्तति कहा गया है। (विवेक) ॥ ३. स्पन्दशास्त्र और उसके सिद्धान्त— 'स्पन्द' का स्वरूप—भास्करराय ने 'सेतुबंध' (यो० हृ० की टीका) (१।१८) में कहा है कि—'स्पन्द' षट्त्रिंश तत्त्वात्मक विश्व को कहते हैं और देवी तद्रूपिणी है— 'स्पन्दः षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं विश्वम् । तद्रूपिणी तदभिन्नाम् ।।'१ 'स्पन्द' परमानन्दरूपिणी, निसर्गसुन्दरी, शिवादिक्षित्यन्तषट्त्रिंशत्तत्व स्वरूप में विश्वाकार-अभिव्यक्त, समस्त प्राणियों की आत्मा, परमशिव में सामरस्य द्वारा अभिन्नतया अवस्थित, देवत्रय, शक्तित्रय, बीजमय की समष्टि, प्रकाश-विमर्शसामरस्यरूपिणी परा भट्टारिका, स्वैराचारपरा, स्वातन्त्र्यशक्तिरूपा, चिद्रूपा, तुरीय मन्त्रवाच्या महात्रिपुरसुन्दरी ही 'स्पन्द' हैं—२ 'तन्मयीं परमानन्दनन्दितां स्पन्दरूपिणीम् । निसर्गसुन्दरीं देवीं ज्ञात्वा स्वैरमुपासते ।।'३ अभिनवगुप्तपाद 'तन्त्रालोक' (५ आ० ७९) में कहते हैं—'विमर्श संवित् स्पन्द है'यह परप्रमाता शिव रूप अन्तर तत्त्व में सामान्यरूप से और माया से पृथिवी पर्यन्त बाह्यविस्फार भी भेदभूमि में विशेषरूप से शाश्वत उल्लसित है—इसे ही 'विमर्श' 'स्पन्द' 'हृदय' 'विसर्ग' आदि अनन्त संज्ञाओं से विभूषित किया गया है— 'सामान्य स्पन्द'—यह सर्वातिशायी विश्रान्ति धाम है । सिद्ध लोग वहीं विश्राम करते हैं— अन्तर्बाह्ये द्वये वापि सामान्येतर सुन्दरः । संवित्स्पन्दस्त्रिशक्त्यात्मा संकोच प्रविकासवान् (आ०५।७९) जयरथ 'विवेक' में कहते हैं—'स एव हि संवित्स्पन्दोन्तः परप्रमात्रात्मनि शिव- तत्त्वे सर्वविशेषस्वीकारात् सामान्यात्मा, अत एव प्रविकासवान् अहमिति, 'बाह्ये' मायात: क्षित्यन्तं भेदोल्लासाद्विशेषात्मा, अतएवान्योन्यव्यावृत्त्या संकोचवान् इदमिति । द्वयेऽन्त- र्वहीरूपे विद्यापदे समधृतपुलापुटन्यायेन 'अहमिदम्' इति सामान्य विशेषात्मा अतएव संकोचविकासवान् अतएवाशेषोल्लासकारित्वात् इच्छादिशक्तित्रयात्मा इति स एव परं विश्रान्तिस्थानम्' ।४ 'विशेष स्पन्द' 'औन्मुख्य'—इदमात्मक विमर्श 'विशेष' नामक स्पन्द है और यही 'औन्मुख्य' संज्ञा से भी विभूषित है—


१. सेतुबन्ध । २. योगिनीहृदयदीपिका । ३. योगिनीहृदय । ४. तंत्रालोक—विवेक (५/७९) ।

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