भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 253

१५२ स्पन्दकारिका इति प्रोक्तं तथा च श्रीमालिनीविजयोत्तरे ॥ (१।२३) 'अज्ञानं' संसृतेर्हेतुर्ज्ञानं मोक्षैककारणम् ॥ (तन्त्रलोक १।२२) 'मिथ्याज्ञान' संसार का कारण है । इसके विपरीत 'तत्त्वज्ञान' है । इससे अज्ञान दूर होता है और मोक्ष प्राप्त होता है— 'मोक्ष एव उपादेयः तत्प्रतिपक्षभूतः संसारश्च हेयः । तस्य च मिथ्याज्ञानं निमित्तं, तत्प्रतिकूलं च तत्वज्ञानम् । (विवेक) निजाशुद्धासमर्थस्य कर्तव्येष्वभिलाषिणः । यदा क्षोभः प्रलीयेत ततः स्यात् परमं पदम् ॥ 'परमपद' 'मालिनीविजयोत्तर तन्त्र' के अष्टादशोऽधिकार में कहा गया है— निरोधं मध्यमे स्थाने कुर्वीत् क्षणमात्रकम् । पश्यते तत्र चिच्छक्तिं तुटिमात्रामखण्डिताम् ॥ (१८।३७) तदेव परमं तत्त्वं तस्माज्जातमिदं जगत् ॥ प्राप्नोति परमं स्थानं भुक्त्वा सिद्धिं यथेप्सिताम् ॥ ४३) 'अशुद्धि' क्या है? 'तन्त्रालोक' (४।१९८) में कहते हैं कि — १) यह समस्त दृश्यादृश्य अस्तित्व ब्रह्म ही तो है । देह आदि समस्त वस्तु तत्त्व परब्रह्मात्मक ही तो है फिर कैसी शुद्धि कैसी अशुद्धि? इसका उत्तर देते हुए अभिनव- गुप्त कहते हैं— सबके शिवात्मक होने पर भी यह भेदप्रदा बुद्धि ही अशुद्धि बन जाती है । बुद्धि का परिष्कार ही शुद्धि है— शिवात्मकेष्वप्येतेषु शुद्धिर्या व्यतिरेकिणी । सैवा शुद्धिः पराख्याता शुद्धिस्तद्धीविमर्दनम् ॥ (४।१९८) शुद्धि एवं अशुद्धि में भेद क्या है ? परतत्त्व से शून्य वस्तु ही अशुद्ध है अन्यथा कुछ भी अशुद्ध नहीं है— अशुद्धं नास्ति तत्किंचित्सर्वं तत्र व्यवस्थितः । यतेन रहितं किंचिदशुद्धं तेन जायते ॥ (विवेक २.८९) 'अभिलाषा' क्या है । 'अभिलाषा' एक मल है । 'अभिलाषो मलोऽत्र तु' (स्वच्छन्द० ४-१०४) । शून्यप्रमाता 'अभिलाषा' रूपी मल के प्रभाव से आणवमल ग्रस्त हो जाता है । मेय को स्वीकार करके भेदवाद की भूमि पर गिर पड़ता है । विमर्श के कारण में उच्छलन प्रारंभ होता है । स एव स्वात्मा मेयेऽस्मिन्भेदिते स्वीक्रियोन्मुखः । पतन्समुच्छलत्वेन प्राणस्पन्दोर्मिसंज्ञितः ॥ (६।११)