भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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१५४ स्पन्दकारिका 'दाह' = मल की वासना एवं संस्कार का औदासीन्य ॥ 'आप्लावन' की भूमिका क्या है?१ एवमाप्लावनमप्यज्ञानव्यपोहाविनाभावोद्भूतस्वरूपलाभलक्षणाह्लाददायित्वादमृतायमानं यद् ज्ञानं स्वात्मावबोधस्तत्प्रसरधारावाहिकोपकल्पिता शुद्धिः पवित्रीकरणमिति ॥२ 'आप्लावन' = अज्ञान का व्यपोह, स्वरूप लाभ, आह्लादिशय-प्राप्ति, अमृताय- मान ज्ञान की प्राप्ति, स्वात्मस्वभाव का प्रसार और उससे पवित्रीकरण ॥३ क्रमवासना का मत—(महार्थमञ्जरी की दृष्टि से साम्य) संवित् सतत्त्वनैर्मल्यसिद्धये शोषणादिकम् । विकल्पसार्वभौमस्य शरीरस्याश्रयाम्यहम् ॥ परिमल—१) प्राणपरिस्पन्द के कारण प्राणीभूतवायुतत्त्व के साथ तादात्म्यानु- संधान के अनन्तर करिष्यमाण 'दाह' आप्लावन' की योग्यता प्राथमिक पूजा-नियम है । इसके बाद— २) परम प्रमातृतापरामर्श के द्वारा उनकी अवच्छिन्नप्रमातृत्ता का विगलनरूप 'दाह' संपाद्य है । विज्ञानभट्टारक में भी कहा गया है— कालाग्निना कालपदादुत्थितेन स्वकं पुरम् । प्लुष्टंविचिन्तयेदन्ते शान्ताभासः प्रजायते ॥ इसी के दृढ़ीकरणार्थ अलौकिक अहन्तानन्दचन्द्रिकामय महाप्रमेयामृतप्रवाहाभिषेका- नुभूति का आप्लावन आवश्यक है । कहा भी गया है— सर्वं जगत् स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं स्मरेत् । प्लुष्टस्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ॥ (विज्ञानभट्टारक) आणव मल४—'स्वातन्त्र्यहानि स्वातन्त्र्य बेधिस्य' स्याथबोधता' कार्ममल५ = 'कार्ममलस्याप्यावरकत्वं' 'धर्माधर्मात्मकं कर्म सुखदुखादिलक्षणम्' —मालिनीविजय मायीय मल६—'भिन्नवेद्यप्रथात्रैव मायाख्यं जन्मभोगदम् कर्तर्यबोधे कार्मं च ...।' —श्रीप्रत्यभिज्ञा ॥ 'कंचुक' भी मल स्वरूप है । कंचुक द्विविध है: अन्तरंग = 'माया'—बहिरंग = प्रकृति से माया पर्यन्त ॥ 'कार्ममल' = मायीय एवं प्राकृतिक (कार्म) चकंचुक, कोश या मल के अतिरिक्त परमसूक्ष्म कोश 'आणवमल' है । ये तीनों मल भी तत्वान्तर्गत ही हैं ।७ सृष्टि का प्रथम स्पंदन कब?— वस्तुतः शिव ज्ञान है और 'मल' अज्ञान है १-३. परिमल । ४. प्रत्यभिज्ञा । ५. मालिनीविजय । ६. परमार्थसार (अभिनव) । ७. अभिनवः परमार्थसार ।