स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः १७१ दृष्टि १४) सोमानन्दपाद ठीक ही कहते हैं कि शक्ति का शक्तिमान से पार्थक्य संभव नहीं है—'एवं न जातु चित्तस्य वियोगस्त्रितयात्मना ॥' परमात्मा 'विश्वोत्तीर्ण' है—इसका अर्थ यह है कि वह सुख दुःख, भय, शोक, अभाव, एवं अनेक द्वन्द्वों ममत्व, अभिमान आदि से उत्तीर्ण है—इन क्षोभों से अतीत है। शान्तब्रह्मवादियों के संवेदन-शून्य ब्रह्म को शैव दार्शनिक जड़ मानते हैं—'संवित्ति शून्यं ब्रह्मत्ववादिनां जड़तैव सा ।'१ (सोमानन्दाचार्य) ॥ अभिनवगुप्तपादाचार्य 'तन्त्रालोक' में कहते हैं कि 'हृदय' (अहं प्रत्यवमर्शात्मक बोध) में विमर्श की तरंगें उठती रहती हैं। 'विमर्श' चेतन स्पन्द है। विश्व का 'द्रावण' (जगत् का इदं रूप में बाह्यावभासन या विश्व-प्रसारण) और उसका प्रसृत भाव जगत् का आन्तर अहंप्रत्यय में लय करने की क्रियाशीलता विमर्श ही है। 'स्पन्द' के प्रसार की दिशायें दो हैं—१) 'बहिर्मुख प्रसार' २) 'अन्तर्मुख प्रसार' । 'बहिर्मुख प्रसार' = विश्वात्मक = विश्व विकास । 'अन्तर्मुख प्रसार' ।। स्वात्म- सङ्कोच । प्रसारित विश्वात्मकता को मूल केन्द्र में समेटना ॥ 'स्पन्द' की यही द्विमुखी क्रियाशीलता है जिसे कि—१. 'स्वरूपोच्छलन' २. 'किंचिच्चलन' कहा जाता है। क) हृदये स्वविमर्शोऽसौ द्राविताशेषविश्वकः । भावग्रहादिपर्यन्तभावी सामान्यसंज्ञकः ॥ स्पन्दः स कथ्यते शास्त्रे स्वात्मन्युच्छलनात्मकः ॥२ ख) किंचिच्चलनमेतावदन्यस्फुरणं हि यत् । ऊर्मि रेषाविबोधाब्धेर्न संविदनया विना ॥३ किंचिच्चलनात्मक स्फुरणा का स्वरूप—'स्पन्द' किंचिच्चलनात्मक है। इसका स्वरूप निम्नांकित है—और इसके दो रूप हैं—१. 'सामान्य स्वरूप' २. विशिष्ट स्पन्द । क) सामान्यस्पन्द—विश्व-प्रसृत धर्म । 'राम' मानव है । मानवता उसका 'सामान्य' एवं 'रामत्व' (सामान्य का) विशिष्ट स्वरूप है। एक जातिगत धर्म है और दूसरा व्यष्टिगत विशिष्ट धर्म है किंचिच्चलनात्मक स्फुरण विश्व के स्थूल-विकास (जगत् की सृष्टि = आदि सर्ग) और प्रलय (अन्त में संहार काल) इन दोनों स्थितियों में सामान्य रूप से प्रसृत होती है अतः उसे 'सामान्य स्पंद' कहते हैं। इसकी गति अनवरुद्ध रूप में अग्रपद होती रहती है। इस अवस्था में प्रवहमान स्पन्द शक्ति घट, पट, नील, रक्त, आदि विकल्पों में विभाजित नहीं रहती। ख) विशिष्टस्पन्द—जगत् की जो स्थिति का काल होता है उसमें ही सामान्य स्पन्द विकल्पों का विशिष्ट रूप ग्रहण करके (देह, प्राण, नील, सुख आदि बनकर) विश्व के अनेकात्मक अनन्त रूपों में विश्ववैचित्य का अवभासन करते हुए विशेषरूपता का भी उच्छलन (किंचिच्चलन) करता है।' १. सोमानन्दपादः 'शिवदृष्टि' (६.२९) । २. तन्त्रालोक (९.१०२-३) । ३. तन्त्रालोक (९.१८४) ।