भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 28

परिचय एवं पृष्ठभूमि २७ से ऊपर उठकर पति भूमिका में स्वरूपावस्थान प्राप्त करना प्रलय या उदय, पाशों को (मलों को) ग्रहण करके 'पति' द्वारा 'पशु' की भूमिका का मंचन या अभिनय करना या पशु का अपने मूल रूप में अवस्थान आदि सभी शिव की क्रीडायें हैं 'उदय' एवं 'प्रलय' ये भी शिव की क्रीडायें ही हैं। अतः विश्व एक क्रीड़ा है—यही सत्य है— 'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत्'—कहकर स्पन्दसूत्रकार ने जिस क्रीड़ावाद को स्पष्टतः उद्भासित किया है उसी भाव को 'उदय' एवं 'प्रलय' द्वारा शैवी या शाक्ती क्रीड़ा के अर्थ में प्रयुक्त करके भी व्यक्त किया गया है। (४) संकल्पसृष्टिवाद—(भट्टकल्लट ने इस प्रथम सूत्र की व्याख्या—) 'अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य संकल्पमात्रेण जगदुत्पत्तिसंहारयोः'—के रूप में करके सृष्टि-प्रलय दोनों का कारण शिव के संकल्प को बताया है और इस प्रकार—'संकल्प सृष्टिवाद' का प्रतिपादन किया है। (५) 'इच्छासृष्टिवाद'—'इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिः' के द्वारा माण्डूक्यकारिका में गौड़पाद ने जिस 'इच्छासृष्टिवाद' के मत का उल्लेख किया है उसी का प्रतिपादन स्पन्दकारिकाकार ने भी किया है क्योंकि आचार्य रामकण्ठ 'उन्मेष-निमेष' को शैवी इच्छा का पर्याय स्वीकार करते हुए कहते हैं—'उन्मेषनिमेषशब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्यां इच्छामात्रमेकं शङ्करसम्बन्धि प्रतिपाद्यते' । 'मालिनीविजय' (३.५) भी इसी भाव को प्रतिपादित करता है— 'या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी ।' इच्छात्वं तस्य वा देवी सिसृक्षोः प्रतिपाद्यते ॥ (मा०वि० ३.५) (६) स्वातन्त्र्यवाद— 'स्वातन्त्र्यवाद'—यदि 'इच्छा' ही जगत् का उपादान कारण है तो इसे 'स्वातन्त्र्य- वाद' का प्रतिपादक मानना पड़ेगा क्योंकि शिव की स्वधर्मा पराशक्ति (जिसे 'स्वातन्त्र्य- शक्ति' कहते हैं) प्रथमतः 'इच्छा' के रूप में ही विकसित होती है। विश्वरूप में रूपान्तरित या प्रसृत होने की ओर प्रवृत्त या उन्मुख होने के समय शिव की आत्मभूता 'स्वातन्त्र्यशक्ति' सबसे पूर्व इच्छा का ही रूप धारण करती है। 'स्वातन्त्र्य' ही परमात्मा की यथार्थ शक्ति है और वह एक है। इच्छा रूप में परिणत (एवं विश्व का मूलोपादान कारण) स्वातन्त्र्यशक्ति के ही प्राधान्य के कारण स्पन्दशास्त्र के मुख्य सिद्धान्त को कहते हैं। (७) द्वयात्मक अद्वयवाद—(पदार्थद्वयवाद)—'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' एवं 'शक्तिचक्रविभवप्रभवं' वाक्यों का प्रयोग करके स्पन्दशास्त्र ने 'शङ्कर' एवं 'शक्ति' दोनों को मूल पदार्थ स्वीकार करके 'द्वयात्मक अद्वयवाद' को सिद्धान्ततः स्वीकार करते हुए उसे अपना मत व्यक्त किया है। यही मत (सिद्धान्त) प्रत्यभिज्ञाशास्त्र को भी स्वीकार है। (८) सर्व विमर्शवाद (विमर्शसृष्टिवाद)—'संकल्प' 'इच्छा' 'शक्ति' 'सिसृक्षा' आदि शिव के 'विमर्श' हैं। यही 'विमर्श' निखिल जगत् का मूल कारण है अतः