भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 281

१८० स्पन्दकारिका 'क्रमसूत्र' में कहा गया है—'क्रममुद्रया अन्तः स्वरूपया बहिर्मुखः समाविष्टो भवति साधकः । तत्रादौ बाह्यान् अन्तः प्रवेशः आभ्यन्तरात् बाह्यस्वरूपे प्रवेशः आवेश- वशात् जायते, इति सबाह्याभ्यन्तरोऽयं मुद्राक्रमः ॥'¹ 'स्मयमान' इसी योग-भूमिका को संकेतित करता है । समाधि क्रम—(१) 'निमीलन समाधि' = इसमें शाक्तभूमिक योगी इदन्ता रूप भाववर्ग को सामान्य स्पन्द में विश्रान्त करके पराचित् भूमिका में प्रवेश करता है । (२) इसके अनन्तर वह योगी 'उन्मीलन समाधि' के माध्यम से अहन्ता में विश्रान्त भाववर्ग को बहिर्मुखी वमन करता हुआ इदन्ता के क्षेत्र में प्रवेश करता है । अभावब्रह्मवाद शून्यात्मवाद तथा सर्वशून्यवाद की अयथार्थता— नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढ़ता । मतोऽभियोगसंस्पर्शात् तदासीदिति निश्चयः ॥ १२ ॥ अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत् सदा । न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्वं प्रतिपद्यते ॥ १३ ॥ अभाव (कभी भी) भावनीय नहीं बन सकता और वहाँ (अभाव समाधि में) जड़ता का अभाव भी नहीं है । क्योंकि (अभाव समाधि से उठने पर व्युत्थानावस्था में) भाषण से संसृष्ट होने पर—'वह मेरी शून्य अवस्था थी'—ऐसा निश्चय (निर्णयात्मक विमर्श) हो जाया करता है ॥ १२ ॥ इसलिए उस (अभावात्मक जड़ समाधि) को सदैव (पशु समूह की) सुषुप्ति के समान अस्वाभाविक ही समझना चाहिए । वह तत्त्व (स्पन्द तत्त्व आत्मचैतन्य) इस प्रकार (जड़ समाधि की भाँति) स्मर्यमाणता का विषय नहीं बनता ॥ १३ ॥

  • सरोजिनी * भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं—यदि अभाव- भावना (मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ की अनवरत भावना) का अभ्यास करने से योगी को किसी भाव सदृश भूमिका का साक्षात्कार हो भी जाय तथापि वह अवस्था अनित्य होती हे । उसकी अनुभूति सामान्य जीवों की मूढ़ात्मक सुषुप्ति की अनुभूति के समतुल्य है । कारण यह कि आत्मा का सत्स्वरूप चिद्रूप है और उसकी विद्यमानता अखण्ड, नित्य एवं त्रिकालबाधित होती है । शास्ता के उपदेश पर दृढ़ रहकर उसी आत्म तत्त्व का निरन्तर अनुशीलन करते रहना चाहिए । अब ग्रन्थकार वेदान्तियों, नैयायिकों, माध्यमिकों, के उस दृष्टि का खण्डन करता है जो ये मानते हैं कि 'क्षोभ' का नाश होने पर केवल शून्य (Naught) मात्र अवशिष्ट रहता है । वे स्पंदतत्त्व की असाधारणता का भी विशद विवेचन करते हैं । 'प्रातिपक्ष्येण लोकोत्तरतां ... स्पंदतत्त्वस्य निरूपयति ॥' १. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।