स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः १९१ सारांश यह है कि स्पन्दमान आत्मसत्ता की प्रत्यभिज्ञा की समस्त अवस्थायें भावात्मक हैं—सर्वाभाव, सर्व शून्य एवं मूढ़ता की अवस्था नहीं है । शैव शास्त्रों में 'शून्य' का अर्थ कुछ अन्य है— १) शून्यता शून्यभूतोऽसौ शून्याकारः पुमान् भवेत् ॥१ (४०) २) अर्धेन्दुबिन्दुनादान्त शून्योच्चाराद भवेच्छिवः ॥२ (४२) ३) विश्वमेतन्महादेवि! शून्यभूतं विचिन्तयेत् ॥ (५७) ४) ज्ञानायत्ता बहिर्भावा अतः शून्यमिदं जगत् ।३ ५) प्रणवादिसमुच्चारात् प्लुतान्ते शून्यभावनात् । शून्यया पराया शक्त्या शून्यतामेति भैरवि ॥४ (३९) अभावसमाधि = (१) साधारण पशुवर्ग में प्राप्त । (२) मोहात्मक सुषुप्ति, प्रगाढ़ निद्रा जैसी कृत्रिम एवं जड़ता की अवस्था । (३) यह अभाव समाधि पशुवर्ग की सुषुप्ति के समान कृत्रिम है और स्मर्यमाण नहीं बन पाता । मैं नहीं हूँ—मैं नहीं हूँ—इस प्रकार अभावात्मक भावना की निरन्तर कल्पना, ध्यान एवं अभ्यास करने पर यदि साधक को ऐसी भूमिका का साक्षात्कार भी हो जाय तो भी वह भूमिका कृत्रिम एवं अनित्य होगी । आत्मा का यथार्थ स्वरूप तो चिद्रूप है और उसकी सत्ता तो त्रिकालाबाधित एवं नित्य है । भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं—'अभावभावलब्ध भूमिकस्यापि कृत्रिमा अनित्या सा अवस्था, यथा, सौषुप्ते पदे, यस्मात् चिद्रूपत्वं तु आत्मनः स्वरूपं नित्य सन्निहितं तदेव गुरूपदेशेन नित्यमेवानुशीलनीयम् ॥'५ (अ) पशुवर्ग की सुषुप्ति अवस्था—'शिवसूत्र' में इसकी व्याख्या इस प्रकार की गई है—'शिवसूत्र' (१) 'अविवेको माया सौषुप्तम् । (शिवसूत्र १.१०)' (२) 'यत्रार्थस्मरणे न स्तस्तत्सौषुप्तमुदाहृतम्' (शिवसूत्रः १.१०) (३) 'ज्ञानज्ञेयस्वरूपायाः शक्तेरनुदयो यदा । चिद्रूपस्याविवेकः स्यादसावेवाविमर्शतः । सैव मायावृत्तिजालपोषकत्वात्प्रकीर्तिता ॥ सुषुप्तता ॥ —शिवसूत्रवार्तिक (४) 'यस्तु अविवेकोविवेचनाभावोऽख्यातिः एतदेव मायारूपं मोहमयं सौषुप्तम् ॥ (शिवसूत्रविमर्शिनी १.१०) ।' पशुप्रमाता में सुषुप्ति एवं प्रगाढ़ निद्रा (ज्ञानाभाव) की अवस्था है । इसमें जागृति, स्वप्न, तुरीय, तुरीयातीत आदि किसी भी प्रकार का ज्ञान नहीं रहता किन्तु चेतना रहती है तभी वह सोने के बाद कहता है कि 'मैं खूब गहरी नींद सोया ।' 'मैं सुखपूर्वक सोया' आदि । इसमें तमोगुण के आवरण के कारण उत्पन्न मोह की सान्द्रता के कारण वेद्य प्रमेयों का ज्ञान या स्मृति नहीं रहती— १-४. विज्ञानभैरव (१७) । ५. भट्टकल्लट : 'स्पन्दसर्वस्व' ।