भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 30

परिचय एवं पृष्ठभूमि २९ समस्त विश्व को शिव का विमर्श या शक्तिरूप प्रतिपादित करने से तथा उन्मेष-निमेष से 'प्रलयोदय' मानने से भी अद्वैत की ही पुष्टि होती है। निरपेक्ष शक्ति अपने स्वस्वरूप के उपादान से स्वात्मभित्ति पर चित्रात्मक जगत् को चित्रित करती है। जगत् उसका व्यक्त स्वरूप-उसका चित्र-लेखन या आभास मात्र है अतः सर्वत्र अद्वैतभाव ही प्रतिष्ठित है। स्वभाववाद एवं स्वस्वरूपवाद—जब भी 'आत्मा' या 'परमात्मा' के विषय में कोई बात कही जाती है तब यह ऐसा ही लगता है कि यह किसी 'अन्य' के विषय में बात कही जा रही है जो कि अप्रत्यक्ष रूप से हमसे शायद सम्बद्ध तो है किन्तु अनुभव के धरातल पर उसका अपने से संबंधित होना भी (आत्मानुभव का विषय न होने के कारण) प्रमाणित एवं असंदिग्ध नहीं है। जो 'अन्य' है और स्वानुभव का विषय न होने के कारण केवल कल्पना का विषय है उसकी साधना करना भी कितना सार्थक होगा? इस प्रकार के अनेक विकल्प एवं तर्क मन में उठते हैं। इन्हीं कारणों से जैनियों ने 'परमात्मा' के अस्तित्व को भी स्वीकार करने का निषेध कर दिया और केवल अपने स्वस्वरूप (आत्मा) की उपासना को ही स्वीकार किया। बौद्धों ने 'आत्मा' और 'परमात्मा' दोनों का निषेध करके अपनी सत्ता का और निकट से संधान करते हुए साधना के नूतन मार्ग का प्रवर्तन किया। किन्तु जैन धर्म में भी आत्मोपासना की ही बात करते-करते ऐसा प्रतीत होने लगा कि मानों आत्मा भी हमसे पृथक् कोई अन्य सत्ता है और उसे पाने या उसका साक्षात्कार करने हेतु किसी अपने से अन्य (आत्मा नामक तत्त्व) की शरण में जाना पड़ेगा। यह 'अहं' (व्यक्ति का भौतिक अस्तित्व) और 'त्वं' (आत्मिक सत्ता) की भेद-दृष्टि, 'आत्मा' का अपनी जागतिक सत्ता से पृथक् स्थिति का भान कराता रहा अतः 'आत्मा' शब्द भी अपने से 'अन्य' की श्रेणी में अनुभूत होने लगा यथा बौद्धों का 'शून्य' एवं 'विज्ञान' । 'स्पन्ददर्शन' एवं 'प्रत्यभिज्ञादर्शन'—इन दर्शनों ने आत्मा एवं परमात्मा दोनों को व्यक्ति का आन्तर स्वभाव, आन्तर शक्ति 'स्वभाव' 'स्वस्वरूप' कहकर उपास्य- उपासक की विप्रकृष्टता को दूर कर दिया। 'स्पन्दकारिका' में 'आत्मा' एवं 'परमात्मा' या 'शिव' तथा 'शक्ति' का भी अत्यल्प प्रयोग किया है और सर्वत्र उस 'आत्मा' एवं 'परमात्मा' को अपनी ही अभिन्नसत्ता के रूप में प्रतिष्ठित करने हेतु बार बार 'स्वस्वरूप' 'स्वस्वभाव' शब्दों का प्रयोग किया है। उद्देश्य यह था कि साधक यह न माने कि वह अपने से पृथक् किसी अन्य महत्तम सत्ता की उपासना कर रहा है या वह जिसकी आराधना कर रहा है वह अपने से पृथक् कोई अन्य सर्वातिशायी स्वतन्त्र सत्ता है जिसकी कि वह आराधना कर रहा है। परमात्मा को अपने से निकटतम से निकटतम देखने का प्रयास 'शिवोऽहं' 'अहं ब्रह्मास्मि' 'अयमात्मा ब्रह्म' 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों द्वारा भी किया गया किन्तु 'अहं' एवं 'शिव' (शिवोऽहं) अहं + ब्रह्म + अस्मि (अहं ब्रह्मास्मि) तत् + त्वं + असि (तत्त्वमसि) में भी 'स्व' एवं 'पर' (साधक एवं आत्मा तथा परमात्मा) की पृथकता का भाव बना ही रहा और उसने साधना में साधक को साध्य से पृथक् ही रक्खा।

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक) · पृष्ठ 30, कुल 519 में से · BharatKosha