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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

२०६ स्पन्दकारिका इसे ही किसी ने कहा है कि—यह संविदात्मा समस्त कृत्यों में स्वतन्त्र है। न किसी का नियोज्य है और न विघ्नवान्। प्रवृत्ति एवं निवृत्ति दोनों दशाओं में यह ईश्वर ही है। यह अलुप्तशक्ति एवं अविनाशी है—१ 'स्वतन्त्रः सर्वकृत्येषु न नियोज्यो न विघ्नवान्। प्रवृत्तोऽस्य प्रवृत्तो वा यतस्तेन त्वमीश्वर ॥ वीर्यं सदाऽलुप्तशक्तिः नाशाभावश्च तद्गतः ॥' इसका वीर्य यह है कि इसकी आत्मसत्ता कभी परिभ्रष्ट नहीं होती। यह कार्य में अन्वित नहीं होता, स्वयं होता है। आभूषण में स्वर्ण की अनुगति नहीं है—वह स्वर्ण ही है। स्वर्ण का कण-कण स्वर्ण है। कहा भी गया है—२ आत्मसत्वापरिभ्रंशलक्षणाद्वैर्यमासत: । वीर्यादितच्च ते कार्येऽनन्वयः स्वर्णवच्च यः। अनन्तशक्तिः शक्तिः सा सामर्थ्यात् सर्वतः सदा ॥'३ तस्य = उसका। परमार्थसत परम तत्त्व का। कदाचित् = किसी समय। लोपः = लुप्त होना। स्वरूपोच्छेद। अन्यस्य = अन्य का उससे व्यतिरिक्त अनित्य वेद्य वस्तु का। अनुपलंभनात् = अनुभव के अभाव के कारण। किसका लोप नहीं होता? जो 'अंतर्मुख' (भिन्न रूप से स्थित बाह्य वेद्य के अभाव के कारण जो स्वान्तःमुख है) अर्थात् जिसका 'मुख' (शक्ति) स्वात्मा में अवस्थित है—उसका लोप नहीं होता। भाव = आत्मा नामक तत्त्व। सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् = सर्वज्ञता आदि गुणों का केन्द्र। समस्त वेद्यवर्ग एवं वेदक वर्ग के गुणों या धर्मों का अनन्यसाधारण अधिकरण। आत्मा की 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' दो प्रकार की शक्तियाँ हैं और वे पुरुषावस्था में अन्तःकरण-बहिष्करण व्यापार के उपशान्त हो जाने पर केवल स्वात्म मात्राभिमुखशक्ति- मात्र रूप से अवशिष्ट रह जाती हैं। यही है उनका अन्तर्मुखीभाव। 'मुख' का अर्थ है शक्तिः 'मुखशब्देन च शक्तेः व्यवहारो दृष्टो'—'शैवीमुखमिहोच्यते' (पारमेश्वर)। बाह्य विषयों के ग्रहण न होने मात्र से योगी भ्रमवश उस भाव को अभाव मानने लगते हैं। अनुपलंभ = (अन + उप + लभ् + घञ् + नुम्)। = अप्राप्ति। अनुपलब्धि। नित्यवर्तमान एवं अविलुप्त पराशक्ति के भाव का भला लोप कैसे संभव है क्योंकि आत्मा से व्यतिरिक्त अन्य वस्तु की सत्ता ही नहीं है। केवल अज्ञान (मोह) के कारण, अपने स्वरूप को भूला हुआ व्यक्ति, इस तथ्य को नहीं समझ पाता। प्रबुद्ध व्यक्ति तो १-३. उत्पलाचार्य स्पन्दप्रदीपिका।

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