स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ स्पन्दकारिका एवं तुर्यावस्था में। पदद्वय से अन्यत्र । चिन्मय = 'चेतयत इति चित् उपलब्धृ-स्वभाव आत्मा ईश्वरः तन्मात्रप्रकृतिः ।। 'अन्यत्र' (सुषुप्ति एवं तुर्यावस्था) को उन दोनों (जागर- स्वप्न) पदों से व्यतिरिक्त होने के कारण (क्योंकि यहाँ वेदनीय का अभाव रहता है) निष्कलस्वात्ममात्रविश्रान्तशक्ति रूप ईश्वर ही प्रकाशित होता है । जागर एवं स्वप्न ज्ञान- ज्ञेय से युक्त अवस्थायें हैं तथा सुषुप्ति एवं तुर्य अवस्थायें चिन्मयत्व से युक्त अवस्थायें हैं । जागर एवं स्वप्न की अवस्थायें स्थैर्य एवं अस्थैर्य प्रतिपत्ति के विकल्पों से निर्मित हैं । ईश्वर परिकल्पित सर्ग जागरावस्था में दृढ़ता से प्रतिपादित होता है किन्तु स्वप्न में स्थैर्यहीनता के साथ । 'स्वप्नावस्था का सर्ग क्षेत्रज्ञपरिकल्पित होता है (जीवात्मा-निर्मित होता है) सुषुप्तावस्था में इन दोनों पदों की स्थिति से भिन्नता है । यहाँ तो चिन्मात्ररूप तत्त्व के रहने पर भी मोह के वशीभूत होकर— 'अहं' इस उपलब्धृ-चमत्कार से रहित होने के कारण असत् के समान प्रतीति होती है । 'तुर्य पद' में भी तो उसी जागृति- स्वप्न-सुषुप्ति के संवित् तत्त्व की उपलब्धि होती है किन्तु भेद यह है कि यहाँ उसकी उपलब्धि आत्मा के रूप में होती है—'तस्यैव तु तत्त्वस्य परमार्थसत्तया आत्म- त्वेनोपलब्धिस्तुर्यपदे—इत्ययं सुषुप्ततुर्ययोर्भेदः ।।' इसी से चारों पद—(१) 'विश्व' (२) 'तैजस' (३) 'प्राज्ञ' एवं (४) 'तुर्य' नाम से प्रसिद्ध हैं । 'ज्ञान ज्ञेयभेदेन द्विरूपम्' की यही व्याख्या है । प्रश्न यह उठता है कि— जागृतावस्था एवं स्वप्नावस्था तो ज्ञान-एवं ज्ञेय से युक्त होकर एवं सुषुप्तावस्था तथा तुर्यावस्था चिन्मयत्व के द्वारा प्रकाशित हैं अतः प्रकाशन की दृष्टि से तो दोनों में अभिन्नता है अतःपद तो केवल दो ही हैं फिर पदचतुष्टय की बात कैसे कही जाती है? —इसी के उत्तर स्वरूप ऊपर कहा गया कि ये चार पद निम्न हैं—(१) विश्व, (२) तैजस, (३) प्राज्ञ, (४) तुर्य । ज्ञातृ-ज्ञान-ज्ञेय के रूप त्रिपुटी के विभाग (विभाजन) के विभ्रम के ध्वस्त होने पर एकमात्र (अद्वितीय) परमार्थ सत् चित्रप्रकाशैकरूप, तथा उसी प्रकार के स्वभावानुभवितृता मात्र धर्म के लक्षण वाले तत्त्व की जो जिज्ञासा होती है उसी उद्देश्य से—'तदन्यत्र तु चिन्मयः' कहा गया है ।१ पदत्रय ('त्रिपदाव्यभिचारिणी' का० १७, 'पदद्वये' १८) ┌─────────────────┼─────────────────┐ (१) जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति ┌────┼────┐ ┌────┼────┐ ┌────┼────┐ जाग्रत जाग्रत जाग्रत स्वप्न स्वप्न स्वप्न सुषुप्ति सुषुप्ति सुषुप्ति जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति (२) जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति ┌──┴──┐ ┌──┴──┐ ┌──┴──┐ मुख्य अमुख्य मुख्य अमुख्य मुख्य अमुख्य १. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।