भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 321

२२० स्पन्दकारिका अवस्थायें कितनी ही बदलती जायें किन्तु अवस्था नहीं बदलता । 'जाग्रत' 'स्वप्न', 'सुषुप्ति', 'तुर्य', 'तुर्यातीत' अवस्थाओं में अवस्थाता (प्रमाता = पशु) किन- किन रूपों में अवस्थित होता है ?

अवस्थाआत्मा का स्वरूप-धारणअनुभविता
१. जाग्रत अवस्थाआत्मा = ज्ञेयपदार्थों का रूप धारण करने वालीआत्मा
२. स्वप्नावस्थाआत्मा = ज्ञान का रूप धारण करने वालीआत्मा
३. सुषुप्ति और तुर्यावस्थाआत्मा = चिन्मात्र रूप में प्रकाशमान होने वालीआत्मा
(१) 'ज्ञानज्ञेयभेदेन द्विरूपे जाग्रतत्स्वप्नात्मके पदद्वये संवेदनम् ।'
(२) 'सुषुप्ततुर्यात्मके पदद्वये पुनश्चिद्रूपत्वेन केवलम् अनुभवः ।'
(३) 'न तु द्वितीयमन्यत्वेन उपलभ्यते ॥'—'स्पन्दसर्वस्व' (भट्टकल्लट)
'ज्ञानरूपता' = स्वप्नावस्था से सम्बद्ध है ॥
'ज्ञेयरूपता' = जाग्रतावस्था से सम्बद्ध है ॥
'जाग्रत' 'स्वप्न' 'सुषुप्ति' = ध्यान-धारणा-समाधि ॥
'ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः ।
पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥' (का० १८)
(१) जाग्रत अवस्था में शक्ति का स्पन्दन (स्फुरणा) का रूप = 'ज्ञेयता' ।
(२) स्वप्नावस्था में शक्ति-स्फुरण संकल्प विकल्पात्मक 'ज्ञप्ति' ॥
(३) सुषुप्ति अवस्था में शाक्त स्फुरणा चिन्मय है किन्तु ज्ञेयता संस्कार रूप में अवशिष्ट रहने के कारण पूर्ण चिन्मय नहीं है ।
(४) तुर्यावस्था में ज्ञेयता के संस्कार भी नहीं रहते अतः इसमें शक्ति स्फुरणा का रूप पूर्ण चिन्मय है ।
जाग्रत अवस्था—मेयभूमिरियं मुख्या जाग्रदाख्या' (तं० १०.२४०) ।
प्रमेयभूमिका के रूप में यह अवस्था मुख्य अवस्था है । विमर्श शक्ति (संवित् भट्टारिका) प्रमेय भूमिका पर अवरोहरण करती हुई प्रमेय, प्रमाण, प्रमा, एवं प्रमाता बन कर विश्व के रूप में स्पंदित होती है । इस अवस्था में वेद्य पदार्थ व्यावहारिक सत्य है अन्तः संवेदन ही वेद्य पदार्थ के रूप में रूपान्तरित होता है । इस अवस्था में स्पन्दात्मिका विमर्श शक्ति ही ज्ञेय (प्रमेय) बनकर प्रस्तुत करती है । आन्तर घट पट आदि वेद्य पदार्थों का अवभासन ही बाह्य घट, पट है—
'तथा हि भासते यत्तन्नीलमन्तः प्रवेदने ।
संकल्परूपे बाह्यस्य तदधिष्ठातृबोधकम् ॥
यन्तु बाह्यतया नीलं चकास्त्यस्य न विद्यते ।
कथञ्चिदप्यधिष्ठातृ भावस्तज्जाग्रदुच्यते ॥