स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ स्पन्दकारिका पूर्णाहन्ताविमर्श—‘यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां’ ‘शक्तिचक्रविभव’ पदों का प्रयोग करके कारिकाकार ने शक्ति के स्वरूप ‘पूर्ण अहंविमर्श’—अहं-विमर्शरूपा मौलिक स्फुरणा (जिसके द्वारा यह शक्ति अद्वैत, एक एवं अभिन्न होने पर भी द्वैतात्मक, भिन्नात्मक एवं अनेकात्मक विश्व के रूप में प्रसृत या अवभासित होती है) की ओर भी संकेत करते ही (स्पन्द = किंचित् चलन = सूक्ष्माकारित अहंविमर्शात्मक स्फुरणा—अहंविमर्शात्मक स्पन्द या अहंप्रत्यवमर्श) साधना इनके लक्ष्य इसी को ‘पूर्णाहन्ता’ के आदर्श एवं अखण्ड ‘अहं प्रत्यवमर्श’ के रूप में रेखांकित किया है । अहंप्रत्यवमर्श न करना सर्वोच्च अपराध है ।१ शास्त्र एवं उनके उपदेश भी परमानुग्रहजन्य हैं— कैलासाद्रौ भ्रमन्देवो मूर्त्या श्रीकण्ठरूपया । अनुग्रहायावतीर्णश्चोदयामास भूतले ॥ अनुग्रहवाद— मुनि दुर्वाससं नाम भगवानूर्ध्वरेतसम् । नोच्छिद्यते यथा शास्त्रं रहस्यं कुरु तादृशम् ॥ ततः सभगवान्देवादादेशं प्राप्य यत्नतः । ससर्ज मानसं पुत्रं त्र्यम्बकादित्यनामकम् ॥ (शिवः १०७-१११) अमृतानन्दनाथ ‘दीपिका’ में कहते हैं— ‘तन्त्रावतारं तन्वाते सर्वत्रानुजिघृक्षया ॥’ भगवान् शिव ने अनुग्रहेच्छा से तन्त्रों को अवतरित किया । प्रकाशात्मकः परमशिवोऽहमेव विश्वानुग्रहपरः सन् परापश्यन्तीमध्यमाबैखरीक्रमेण व्यापृत्य विमर्शांशेन प्रष्टा भूत्वा प्रकाशांशेन प्रतिवचनदातापि सन् तन्त्रं समवतारया- मीत्यर्थः । संकल्पवाद—पाश्चात्य दार्शनिक शोपेन हावर की एक पुस्तक का नाम है ‘World as an Idea’ अर्थात् संसार एक विचार मात्र है । यूनानी दार्शनिकों ने भी जगत् को मूल ईश्वरीय विचार की अनुकृति (Emitation) कहा है । स्पन्दशास्त्र के दार्शनिकों ने इसे परमात्मा का ‘संकल्प’ कहा है । भट्टकल्लट ने ‘स्पन्दकारिकावृत्ति’ में इस संकल्पवाद का बार-बार स्मरण कराया है— ‘अनेन स्वस्वभावस्य शिवात्मकस्य संकल्पमात्रेण जगदुत्पत्तिसंहारयोः कारणत्वं’ (वृत्तिः स्पं० का० १।१) । योगी भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं । स्वात्माराम मुनीन्द्र ‘हठयोग प्रदीपिका’ में कहते हैं— संकल्पमात्रकलनैव जगत्समग्रं संकल्पमात्रकलनैव मनोविलासः ।
१. तन्त्रालोक—अभिनवगुप्तपादाचार्य ।