भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 339

२३८ स्पन्दकारिका विकल्प अपनी संस्कारावस्था में चरम भूमि पर पहुंचने पर संविद्रूप बन जाते हैं या स्वयं संवित् पारमार्थिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत हो जाता है । संस्कृत विकल्पों के संस्कार—अन्य संस्कृत विकल्प । (इनका रूप शुद्धविद्या का ही अंश होता है— ‘शुद्धविद्यांशरूपैः विकल्पैः) = सद् ज्ञान या सतर्क के विकल्प ।। योग में ‘सतर्क’ को योग का उच्चतर अंग स्वीकार किया गया है । ‘सतर्क’—तामसिक, राजसिक विकृतियों का नाश ।—असत् तर्क का ध्वंस । विकल्पों को कितना भी संस्कृत क्यों न किया जाय किन्तु उनका पारमार्थिक संस्कृत स्वरूप भी शिवत्व-प्राप्ति नहीं करा सकता । विकल्पसंस्कार और उद्योग—किसी भी विकल्प या विकल्पांश के रहते चिदानन्द शिवत्व (चिन्मात्र शिवभाव) प्राप्त होना संभव नहीं है । पारमार्थिक एवं संस्कृततम विकल्पों से भी मुक्ति प्राप्त करना आवश्यक है । इन सुसंस्कृत विकल्पों का भी तब तक पुनः परिमार्जन (परिष्कार, संस्कार) करना आवश्यक है जब तक कि विशेष स्पन्द रूपान्तरित होकर सामान्य स्पन्द की अद्वैतात्मक भूमिका पर आरूढ़ होकर निर्विकल्प आत्मसंवित् में विश्रान्ति न प्राप्त कर लें । ‘चित्तं मन्त्रः’ की स्थिति ऐसी ही विकल्पशून्यावस्था का विकास भूमि है जहाँ चित्त के साथ मन्त्रों की विमर्शात्मक तद्रूपता आने पर ‘चित्त’ ‘मन्त्र’ एवं ‘देवता’ तीनों में तादात्म्य, एकरूपता या एकाकारता आ जाती है । विकल्प-संस्कार ही अपनी चरम भूमि पर यात्रा कराते कराते साधक को ऐसे उच्चतम सिद्धि-शृंग पर पहुँचा देते हैं जहाँ योगी का परिष्कृत चित्त ही ‘मन्त्र’ बन जाता है । मन्त्र में शक्ति का उदय होने के पूर्व तक या स्पन्दात्मक शाक्त बल के उदय के पूर्व या मन्त्र एवं मननकर्ता के अहं की एकाकारता के पूर्व तक ‘मन्त्र’ मन्त्र नहीं वर्ण मात्र रहते हैं और उनका जप केवल शब्दोच्चारण मात्र रहता है—‘जप’ नहीं बन पाता । विविक्तये = स्वरूपाभिव्यक्ति के लिए । निजं भावं = तुर्यभोगाख्यं स्वभावम् । जाग्रदेव = जाग्रत अवस्था में ही ।। सततं = सर्व काल = सदैव ।। भावं = अपना चिदानन्द, चिन्मय, नित्यात्मक आत्मस्वरूप ।। स्पन्दात्मक परसंवित् में प्रवेश करने हेतु ‘सततोद्योग’ एक प्रमुख साधक है । शिव सूत्र (१।५) ‘उद्यमो भैरवः’ में ‘उद्यम’ की जो व्याख्या की गई है— ‘योऽयं प्रसररूपाया विमर्शमय्याः संविदो झगिति उच्छलनात्मक पर प्रतिभोन्मज्जनरूप उद्यमः स एव सर्वशक्तिसामरस्येन अशेषविश्वभरितत्वात् सकलकल्पनाकुलालं कवलनम- त्वाच्च भैरवो भैरवात्मक स्वस्वरूपाभिव्यक्ति हेतुत्वात् भक्तिभाजाम् अन्तर्मुखैतत्तत्वाधान- धनानां जायते । ... भावनं हि अन्तर्मुखोद्यन्तापद विमर्शनमेव ।।’ ‘परप्रतिभोन्मेषा- वष्टम्भोपायिकां भैरवसमापत्तिम् अज्ञानबन्धप्रशमैक हेतुं ... प्रशान्तभेदावभासंभवति ।।’ (शि०वि० १।५) ‘भैरव’ का पर्याय ही है ‘उद्यम’ ।।—संवित् तत्त्व का उच्छलनात्मक पर प्रतिभो- न्मज्जनरूप उद्यम । भैरव का अर्थ है—भैरवात्मकस्वस्वरूपाभिव्यक्ति ।