स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० स्पन्दकारिका अनन्य विषयक भावभूमि या एक चिन्ताप्रसक्त चिन्तन-भूमि ही 'स्पंद' है। योगी लोग उपायमार्ग में अन्य सभी चित्तवृत्तियों का प्रशमन करके एकाग्र हुआ करते हैं और अति क्रोध, अति हर्ष आदि कोई योगी तत्त्व विमर्शन हेतु तत्काल अंतर्मुखी हो जाता है तो वह शीघ्र ही अपने अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है किन्तु जो योगी नहीं है वे इस स्तर पर भी मूढ ही रहते हैं। कोई व्यक्ति दारुण उपघात या शत्रु-साक्षात्कार के कारण या मर्मस्पर्शी वचनबाण से विद्ध होने के कारण उत्पन्न संजिहीर्षा या अत्यधिक उत्पन्न क्रोध या प्राणेशी के मुखारविन्द को देखने के कारण अत्यन्त प्रसन्नता या किसी अत्याचारी से अपनी रक्षा करने हेतु 'मैं क्या करूँ?' - इस प्रकार उत्पन्न चिन्ता, या किसी शिकार के पीछे धनुष बाण लेकर दौड़ते समय अपने शरीर को भूल कर शिकार के ऊपर लगी दृष्टि के कारण दौड़ते रहने या सिंह या अजगर आदि को देखकर उत्पन्न असीम भय के समय अन्य समस्त वृत्तियों के नष्ट हो जाने पर उत्पन्न अत्यन्त भय की अवस्था में जिस मनोभूमि पर आरूढ होता है वह स्पंद की ही भूमि है। इस अन्यवृत्तिक्षयात्मक पद पर जो आरूढ होता है उस योगी की इस वृत्तिक्षयात्मक अवस्था विशेष में स्पन्दतत्त्व अवश्यमेव प्रतिष्ठित रहता है— 'वृत्तिक्षयात्मके पदे अवस्था विशेषे स्पंदः प्रतिष्ठितः स्पंदतत्त्व अभिमुखी-भूतमेव तिष्ठति ॥'१ अतः इस वृत्तिक्षयपक्ष को समझकर शीघ्र कूर्मांग सङ्कोच (जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को अपने भीतर समेट लेता है) की भाँति क्रोधसंशय आदि वृत्तियों का शमन करके महाविकास-व्याप्ति की युक्ति द्वारा अपनी स्पन्द शक्ति का विमर्शन करना चाहिए। 'विज्ञानभैरव' में कहा भी गया है- २ कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यगोचरे । बुद्धिं निस्तिभितां कृत्वा तत्त्वमावशिष्यते ॥ १०१ ॥ आनन्दे महति प्राप्ते दृष्टे वा बाँधवेचिरात् । आनन्दमुद्गतं ध्यात्वा तल्लयस्तन्मना भवेत् ॥ ७१ ॥ क्षुताद्यन्ते भये शोके गह्वरे वारणद्रुते । कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्ता समीपगः ॥ ११८ ॥३ द्वेष से अमश्र के उद्दीप्त होने पर अत्यन्त क्रुद्ध मनुष्य पहले जिस अवस्था पर पहुँचता है उसकी चित्तवृत्ति जिस स्फार या उन्मुखता का स्पर्श करने लगती है, समागत प्रिय व्यक्ति को देखने आदि से उत्पन्न हर्ष प्राप्त करके जिस परमानन्द की अनुभूति करता है, अनेक कर्तव्यों के कल्लोल में फँसकर- 'यह करूँ या यह करूँ' - इस प्रकार का परामर्श करके जब निश्चयकारिणी दशा पर पहुंचता है, अपनी प्रेयसी के आमंत्रित करने या संभ्रमवश दौड़कर जिस अवस्था पर आरूढ़ होता है उसमें आत्मस्वभाव 'स्पन्द' स्पष्टतया उपलब्ध होता है। ४ १-३. स्पन्दनिर्णय । ४. स्पन्दप्रदीपिका ।