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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 349

२४८ स्पन्दकारिका में अनुभूतचरी, चिदानन्दघन स्पन्दात्मिका अवस्था का अवलम्बन ग्रहण करके स्थित होता है और विकल्पों का शमन करके अविकल्प अवस्था का अवचिल रूप में आश्रय लेता है और ऐसा करके जो योगी प्राणापान दोनों को हृदयभूमि में एकसाथ मिलाकर सौषुम्न मार्ग में स्थित ब्रह्मनाड़ी में ऊर्ध्वमार्ग वाले उदान पथ से शमित करके एवं ब्रह्माधिष्ठित लोक का त्याग करके और ऊर्ध्व कपाटान्त देह व्याप्ति का त्याग करके और तब सूर्य और चन्द्रमा को लय करने वाले महा व्योम में (निःशेषवेद्योपशम रूप परमाकाश में) स्थित होने पर भी गुणनिष्यन्द से व्यामोहित होकर सौषुप्तवत् हो जाता है—शून्यादिभूमि में अवस्थित हो जाता है—वह योगी पूर्णतया अनभिव्यक्तस्वभाव वाला होकर मूढ़ कहलाता है क्योंकि जिसका स्वस्वभाव सम्यक् रूप से अभिव्यक्त नहीं होता वह स्वप्न आदि के द्वारा मुह्यमान होकर अप्रबुद्ध ही रहता है।१ किन्तु जो वहाँ पर भी अपने प्रयत्न-कौशल से उद्यन्तूताशक्ति द्वारा क्षण मात्र भी शिथिल नहीं होता वह तमोगुण से अनभिभूत होने के कारण चिदा-काशमय होने के द्वारा ही अवस्थित होकर ‘प्रबुद्ध’ कहलाता है। अतः अनवरत प्रयास से योगी ही होना चाहिए ॥२ ‘सौषुम्ण अध्व’ का महत्व क्या है? ‘सुषुम्णा’ वाहिनि प्राणेसिद्धयत्येव मनोन्मनी’ = ‘मनोन्मनी’ का उदय ॥ अब इसी स्पन्दतत्त्व के जीवन में उदय होने के लिए उपाय का निर्देश करते हुए ग्रन्थकार कहता है—‘यामवस्थां ... ब्रह्माण्डगोचरम् ॥’ ‘ये हमारे गुरुदेव हैं’ ‘ज्ञानाग्रगण्य हैं और ये अनिर्वचनीय सद्वस्तु का भी निर्वचन कर सकते हैं। इनकी आज्ञा का कोई अतिक्रमण नहीं कर सकता। ये जो कुछ भी मुझसे कहेंगे मैं अवश्य करूँगा—यह दृढ़ संकल्प धारण करके साधक जब उन्मुखतारूप वृत्ति का आलम्बन लेकर स्थिर हो जाता है तब उसकी उस अवस्था में ऊर्ध्वमार्ग से विषुवत प्रवाह के द्वारा सोम, सूर्य, अपान प्राण, मन, सुषुम्णा के मार्ग में (जो कि पराशक्ति का मार्ग है—मध्यम नाड़ी है)—विलीन हो जाते हैं। पता नहीं गुरुदेव क्या आज्ञा देंगे?— यह कुतूहल वासनाओं को पीस डालता है। उस समय साधक ब्रह्माण्ड स्थित शरीर- विषय का परित्याग करके ‘देहाहंभाव’ से मुक्त हो जाता है। कहा भी गया है कि—देह में अहं प्रत्यय का द्वीप भग्न हो गया। अनन्त संवित् रूप निर्मल समुद्र से एकता हो गयी। इन्द्रियसम्मूह अन्तर्मुख हो गया। बस तुम एक अद्वितीय विश्वात्मा हो ॥’—३ ‘जाते देहप्रत्ययद्वीपभंगे प्राप्तैकत्वे निर्मले बोधसिन्धौ। अध्यावर्त्यैवेन्द्रियग्राममन्तर्विश्वात्मा त्वं नित्यमेकोऽवभासि ॥’ ऐसी अवस्था में ‘महाव्योम’ अर्थात् परचिदाकाश में सूर्य एवं चन्द्रमा, ज्ञान और क्रिया—दोनों शान्त हो जाते हैं। स्वभाव में अभिव्यक्ति नहीं होती। स्वप्न, जाग्रत आदि के दृश्यों से मोह नहीं होता। वह प्रबुद्ध और अनिरुद्ध हो जाता है, मानो सुषुप्ति हो। किन्तु उस समय वह प्रबुद्ध और आवरणरहित ही होता है।४ ‘रहस्यस्तोत्र’ में कहा गया है—बड़े-बड़े आकाशगामी सिद्धपुरुष भी, जिन्होंने १-२. स्पन्दनिर्णय। ३-४. उत्पलदेव—‘स्पन्दप्रदीपिका’।