भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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३४ स्पन्दकारिका अनुत्तरविमर्शमयी शिवभट्टारकाभिन्ना हेतुः । (४) चितो माहेश्वर्यसारतां ब्रूते । (५) चिदै- कात्म्येव विश्वशरीरः शिवभट्टारक एव ।। (६) चितिरेव भगवती विश्ववमनात् संसार- वामाचारत्वाच्च वामेश्वर्याख्या सती, खेचरी, गोचरी, दिक्चरी भूचरीरूपैः अशेषैः प्रमातृ अन्तःकरण बहिष्करणाभावस्वभावैः परिस्फुरन्ती । ‘जीवन्मुक्तिवाद’—त्रिक दर्शन ‘विदेह मुक्ति’ ‘सालोक्य’ ‘सामीप्य’ ‘सारूप्य’ ‘सार्ष्टि’ ‘सायुज्य’ आदि का प्रतिपादन न करके समावेशमयी मुक्ति या ‘जीवन्मुक्ति’ में विश्वास करता है—‘इह हि जीवन्मुक्ततैव मोक्षः ।।' १ स्पन्दकारिका में भी कहा गया है— 'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् । सपश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥' २ ऐसा योगी जीवित रहता हुआ भी ईश्वर की भाँति मुक्त रहता है— 'योऽखिलं समग्रं जगत् क्रीडारामतया पश्यन् विभावयन नित्ययुक्तत्वाच्च बंधकारण- स्याज्ञानस्य क्षयात् प्रबोधारतो जीवन्नेवेश्वरवन्मुक्तो' । ३ 'सम्यक् स्वबोधविश्रान्तौ योऽलुप्तानुभवः स्थितः । विषयानपि सोऽश्नन् स्याज्जीवन्मुक्तस्तु तत्त्ववित् ॥' ४ जो लोग यह कहते हैं कि—'विनोत्क्रान्तिं कुतो मोक्षः'? उनका संदेह व्यर्थ है क्योंकि— 'विना स्वभावानुभवेन पुंसः कैवल्यमुत्क्रान्तिबलाद्यदि स्यात् । अत्रापि पक्षे ननु मोक्ष भाक्त उद्धन्धनं यः कुरुते प्रमूढः ॥' और— 'विदेहा अपि बध्यन्ते प्रलये गुणवासिताः । शरीरिणोऽपि मुच्यन्ते विशुद्धज्ञानसंश्रयात् ॥' सर्वचैतन्यवाद—'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' दोनों सर्वचिन्मयवाद या सर्वचैतन्यवाद के प्रतिपादक हैं । इनकी मान्यता है कि कोई भी पदार्थ जड़ है ही नहीं केवल उनमें चैतन्य की अल्पता है न कि अभाव है । चिद्रूपा पराशक्ति की शक्ति अचेतन कैसे हो सकती है? रही चैतन्य की कमी तो यह कमी तो सृष्टि के प्रत्येक स्तर पर न्यूनाधिक विद्यमान है तथा चैतन्य के विभिन्न स्तर चैतन्य की कमी एवं अधिकता पर ही अवलम्बित है । सर्वचिन्मयतावाद—'शिवसूत्र' का प्रथम सूत्र है—'चैतन्यमात्मा' (१।१) भट्टभास्कर इस विषय में कहते हैं— १. स्पन्दप्रदीपिका (उत्पलाचार्य) : प्रथम कारिका की व्याख्या । २. स्पन्दप्रदीपिका (का० ३०) । ३. स्पन्दकारिका (३०) । ४. स्पन्दकारिका : स्पन्दकारिका का 'क्रीडावाद' (इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाऽ- खिलं जगत् ।) । शिवदृष्टि—'क्रीडन्करोति पादातधर्मांस्तद्धर्मधर्मतः । तथा प्रभुः प्रमोदात्मा क्रीडत्येवं तथा तथा ॥' (शि०दृ० १।३८) ।