स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 360, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः २५९ योगिनी कौल मार्ग में 'सहज' = पुरुष तत्त्व + शक्ति तत्त्व का समागम प्रज्ञा + उपाय, (यो० कौ० में—शिव + शक्ति) का समागम !! (२) 'कौलज्ञाननिर्णय' में— 'सहज' = 'कुरुते देहमध्ये तु सा शक्तिः सहजा प्रिये ।।' (सहज शक्ति को शरीरस्थ करके वहीं उपलब्ध करना चाहिए ।) 'सहज' = सहज ज्ञान सहज स्वभाव आदि । नाथपंथ में 'सहज' के प्रयोगों की दिशायें—(१) 'सहज' = परम तत्त्व (२) 'सहज' = परमज्ञान, परम स्वभाव, (३) 'सहज' = परमपद, परमसुख, (४) 'सहज' = सहज जीवन पद्धति । (५) शरीर के भीतर शक्ति से संगम प्राप्त करने की योग पद्धति । विकल्प—घट पट आदि से लेकर शून्य पर्यन्त सभी पदार्थ 'विकल्प' है । अहं परामर्श के भेद—शुद्ध अहं परामर्श ।। मायीय अहं परामर्श ।। जब मितात्मा विश्व से अभिन्नतयावस्थित सविन्मात्र में या विश्व से असंस्पृष्ट स्वच्छ आत्मा में अवस्थित रहता है तब उसे शुद्ध अहं परामर्श कहते हैं । जब की मायीय (अशुद्धपरामर्श) वेद्यस्वरूप देह, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि को अपना आलम्बन बनाता है—उन्हीं को अपना स्वरूप मान बैठता है तब इसे अशुद्ध परामर्श कहते हैं । इसी भेद दशा की प्रतीति ही 'विकल्प' है । इसी की शुद्धि से सहजविद्या का उदय होता है । कारिकाकार ने जिस सद्विद्या (सहज विद्या) का प्रतिपादन किया है एतत्संबन्ध में अभिनवगुप्त 'तन्त्रालोक' (३।१०) में कहते हैं कि (१) भावों के प्रतिघाती भाव मायात्मक होते हैं किन्तु (२) अप्रतिघाती भाव तो सद्विद्यामय होते हैं । मायात्मक भाव स्थूल एवं भेदप्रधान होते हैं । भावानां यत्प्रतीघाति वपुर्मायात्मकं हि तत् । तेषामेवास्ति सद्विद्यामयं त्वप्रतिघातकम् ।। (३।१०)१ सद्विद्यामय भाव ज्ञान शक्तिस्वभाव होते हैं—'तत्सद्विद्यामयं ज्ञानशक्तिस्वभावम् ।। (विवेक पृ० ३२९) ।। मायात्मकपदार्थप्रतिबिम्बरूप एवं ज्ञानात्मकभाव उनके ग्राहक होते हैं ।२ प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द शास्त्र के जो छत्तीस तत्त्व हैं उनमें 'ईश्वर तत्त्व' से निम्न स्तर पर किन्तु मायातत्त्व के स्तर से उच्चतर स्तर पर एवं दोनों के अन्तराल में 'शुद्धविद्यातत्त्व' अवस्थित है— (१) 'विश्वं पश्चात्यन्निदन्तया निखिलमीश्वरो जातः । सा भवति शुद्धविद्या येदन्ताहन्तयोरभेदमतिः ।।' ३ (२) 'ईश्वरो' बहिरुन्मेषो, निमेषोऽन्तः सदाशिवः । सामानाधिकरण्यं च, सद्विद्याहमिदं धियोः ।।' (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ३।३)४ (३) 'तस्यैश्वर्यस्वभावस्य पशुभावे प्रकाशिका । विद्याशक्तिस्तिरोधानकरी मायाभिधा पुनः ।।' (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ३।७७)५ १. तन्त्रालोक । २. विवेक । ३. षट्त्रिंशत्तत्वसंदोह । ४-५. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ।