स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः २६१ (५) 'सहजावस्था' अत्यन्त दुर्लभ है— दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम्। दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना॥ (हठ० प्र० ४।९) 'सहजविद्या' सहज ज्ञान (यौगिक ज्ञान) को आत्मीकृत (क्रोडीकृत) करके चलता है और यौगिक विद्या या यौगिक ज्ञान योग की दृष्टि में इस प्रकार है— ज्ञानं कुतो मनसि संभवतीह तावत्, प्राणोऽपि जीवति मनो म्रियते न यावत्। प्राणो मनो द्वयमिदं विलयं नयेद्यो, मोक्षं स गच्छति नरो न कथंचिदन्यः॥ (४।१५) जब तक 'सहज सदृश तत्त्व' का ध्यान में उदय नहीं होता तब तक 'ज्ञान' दंभ एवं मिथ्या प्रलाप मात्र है— यावद्ध्याने सहजसदृशं जायते नैव तत्त्वम्। तावज्ज्ञानं वदति तददिं दंभ मिथ्याप्रलापः॥ (ह० प्र० ४।११४) योगियों ने 'राजयोग', 'समाधि', 'उन्मनी', 'मनोन्मनी', 'तत्त्व', 'अमरत्व', 'लय', 'शून्याशून्य', 'परं पद', 'अद्वैत', 'निरालम्ब', 'निरञ्जन', 'अमनस्क', 'तुर्या', 'जीवन्मुक्ति' एवं 'सहजा' सभी को समानार्थक माना है— राजयोगः समाधिश्च उन्मनी च मनोन्मनी। अमरत्वं लयस्तत्त्वं शून्याशून्यं परं पदम्। अमनस्कं तथाद्वैतं निरालम्बं निरञ्जनम्। जीवन्मुक्तिश्च सहजा तुर्या चेत्येकवाचकाः॥ —स्वात्माराम मुनीन्द्र (हठयोगप्रदीपिका ४।३-४)