भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 366

द्वितीयः निष्यन्दः २६५ संवेद्य है। प्रकृति से अतीत भी वहीं, प्रकृति का विषय भी वही यही मन्त्रों का प्रत्य- यात्मक कारण है। मन्त्र बाहर और भीतर वर्णरूप से प्रकट होते हैं। वे शाश्वत पदरूप होते हैं। वे मनुष्य के कर चरणादिक के समान हैं। वीर्य का योग होने पर किसी भी काल में प्रयोग करने पर वे सिद्ध होते हैं— स्वात्मैकनिष्ठं चिद्रूपं भावाभावपरिष्कृतम् । स्वसंवेदनसंवेद्यं प्रकृत्यतीतगोचरम् ॥ इयं योनिः स्मृता विप्र मन्त्राणां प्रत्ययात्मिका । ते मन्त्रा वर्णरूपेण सबाह्याभ्यन्तरोदिताः ॥ नैष्कालिकपदावस्थाः करणानीव देहिनाम् । प्रयुक्ताः सर्वकालेषु सिद्ध्यन्ते वीर्ययोगतः ॥ जब शुद्ध बोधात्मक रूप से अन्तर्बाह्य दोनों में उदित मन्त्र का एक बार भी जप किया जाता है तब वह लक्ष बार किये हुए जप के समतुल्य हो जाता है। 'जपसंहिता' में भी कहा गया है—'एक ही मन्त्रनाथ अन्तर एवं बाह्य दोनों में उदित होकर एक हो जाता है और तब उस जप को लक्ष्य संख्या से भी अधिक समझना चाहिए'— 'एकस्य मन्त्रनाथस्याप्यन्तर्बाह्योदितस्य च । यदैक्यं तं जपं विद्धि लक्षसंख्याधिकं मुने ॥'१ तेन = उसके द्वारा। प्रस्तुत व्याख्यान के कारण। एते = ये मन्त्र। आराध्यदेवतावाचकवर्णादिसंनिवेश पूर्णमन्त्र। शिवधर्मिणः = शिव अर्थात् परमेश्वर के अनन्यसाधारण सर्वज्ञता आदिगुण (धर्म) वाले ! शिव से अभिन्नस्वरूप ॥ किस कारण? क्योंकि 'तत्' = समनन्तर प्रतिपादितस्वरूप वाले शिव से सम्बद्ध। बल = सामर्थ्य ॥ शक्ति। आक्रम्य = उच्चिचारयिषावस्था में उसके साथ अभेदोपपत्ति स्थापित करते हुए स्वीकार करके। सर्वज्ञबलशालिनः = सर्वज्ञ शिव के बल द्वारा श्लाघमान होकर 'अधिकाराय प्रवर्तन्ते' = यथास्व प्रतिनियत कार्य संपादन के स्वाम्यर्थ प्रस्तुत होते हैं (प्रसरन्ति)। मन्त्र-विज्ञान ये मन्त्र यदि परमेश्वर से अभेदावस्था प्राप्त न कर लें तब तक ये उत्पादविनाश- धर्मक एवं वर्णमात्रात्मक होने के कारण तृण को भी झुकाने में असमर्थ हैं। पारमात्मिकी शक्ति से भिन्न रहने पर ये तृणा को भी टेढ़ा नहीं कर सकते ॥ मन्त्रों की असमर्थता कब और क्यों?— 'एते हि अनासादित परमेश्वराभेददशा उत्पाद-विनाशधर्मक वर्णमात्रात्मकाः तृण- मपि कुब्जयितुमशक्ताः ।।'—परमेश्वर में अभेदापत्ति के बिना मन्त्रों की यही स्थिति रहती १. उत्पलदेवाचार्य : 'स्पन्दप्रदीपिका'।