भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 371

२७० स्पन्दकारिका इस श्लोक के दूसरी व्याख्या भी की जानी चाहिए—दीक्षादिक में व्याप्त गुरुजनों की इन्द्रियों के रूप में समस्त 'मन्त्र' स्पन्द सिद्धान्त पर आश्रित हैं और वे साधक के मस्तिष्क के साथ स्पन्द में लय हो जाते हैं। दीक्षादिक में प्रवृत्त समस्त आचार्यादिकों के करण रूप समस्त मन्त्र उन स्पन्द तत्त्व रूप 'बल' को अधिगत करके—आराधक के चित्त के साथ भोगमोक्ष के साधन आदि के अधिकार के लिए प्रवृत्त होते हैं और वहीं शान्त, (वाचक शब्दात्मक शरीर रूप) एवं निरञ्जन (शुद्ध) रूप से लय हो जाते हैं। १ (१) मन्त्र स्पन्दसार हैं। मन्त्रों की स्पन्दरूपता एवं स्पन्दसारता का प्रतिपादन ही इस श्लोक का मुख्याभिप्राय है। शैव संप्रदाय के अनुसार (जिसमें ८ एवं १८ भेद हैं) 'मन्त्र' स्पन्द के साथ अभिन्न हैं। (२) मन्त्र, मन्त्रेश्वर आदि के रूप में होने वाली सृष्टि शुद्धसृष्टि है और शिवस्वभावा है किन्तु मायादिरूपा अशुद्ध सृष्टि भी शिव से भिन्न नहीं है प्रत्युत् शिवस्वरूपा ही हैं। शुद्धसृष्टि मन्त्ररूपता है और उनके अधिपति देवता शिव के स्वभाव वाले हैं। २ ये 'मन्त्र' साधक के चित्त की प्रवृत्ति एवं निवृत्ति के निमित्त से अर्थात् उसकी आधारभूत इच्छा से पुनः लीन हो जाते हैं—उसी शक्तिमान् स्वस्वभाव में लय प्राप्त कर लेते हैं। क्योंकि ये स्वस्वभाव के अनुगामी और शक्तिरूप हैं। यही बात 'कालपरा' नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—पर अक्षर रूप वृक्ष में अनेक शक्तियाँ विद्यमान हैं। उनके विवर्त शक्ति के वर्णों के रूप में प्रकट होते हैं और मुख के द्वारा निःसृत होते हैं— ३ पराक्षर तरोधर्तुर्माना शक्तेर्विवर्तगाः । शक्तयो वर्णदेहेषु वक्त्राद्दर्णत्वमागताः ॥ ये शक्तियाँ कृतकृत्य होने के कारण स्वयं शान्त हैं और निरञ्जन (कालुष्यरहित) है, या निरञ्जन तत्त्व से अनुप्राणित हैं। यही कारण है जो शिव शङ्कर में धर्म हैं वे ही मन्त्र में भी अर्थात् मन्त्र भी सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता हैं। सह साधक चित्तेन लीयन्ते तत्र यत् स्मृतम् । ४ शिवतात्मनि सर्वात्म्यात् चाहैतत्सोपपत्तिकम् ॥ साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं अर्थात् आत्मा ही शिव है । ५ मन्त्र योग—ये शिवधर्मीमन्त्र जिस सीमा तक अधिकार-सम्पन्न हैं उस सीमा तक प्रवृत्त होते हुए, अञ्जन (वाच्योपराग मल से या वर्णादिरूप भावनात्मकता) से मुक्त होकर एवं शान्तरूप (शुद्ध अर्थात् संविन्मात्रावशिष्ट, एवं निर्विकार आत्मा के स्वरूप वाला) होकर तत्रैव—परमकारण एवं स्वस्वभावशिव में संप्रलीयन्ते—सम्यक् रूप से लीन हो जाते हैं अर्थात् उनके साथ ऐक्य प्राप्त कर लेते हैं। निरञ्जन—अञ्जनरहित । वाच्योपराग मल से या वर्णादिरूप भावनात्मकता से रहित । शान्तरूपाः = संविन्मात्रावशेष । शुद्ध एवं निर्विकार आत्मा वाले । १-२. स्पन्दनिर्णय । ३-५. स्पन्दप्रदीपिका ।