स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ स्पन्दकारिका 'मन्त्र' द्विविध प्रकार हैं—(१) भोगरूप = 'साञ्जन' (२) मोक्षरूप = 'निरञ्जन' यहाँ निरञ्जन (मायाकालुष्य रहित) एवं शान्त मन्त्रों के विषयों में ही कहा गया है क्योंकि वे ही चिदाकाश में लीन होते हैं। इन मन्त्रों के द्वारा साधक की आत्मा शिवभाव के साथ तादात्म्य प्राप्त कर लेती है। 'मन्त्र' का स्वरूप—(१) 'मन्त्र' परावाक् स्वरूप है—देवतारूप हैं—कुण्डलिनी- शक्तिरूप हैं। 'कामधेनुतन्त्र' में वर्णमाला के प्रत्येक वर्ण को कुण्डलिनीस्वरूप कहा गया है। (२) 'मन्त्र' अहंविमर्शस्वरूप हैं। प्रत्येक विमर्श अभिलापात्मक ही होता है। अभिलाप तो वर्णात्मक होता है अतः प्रत्येक विमर्श शब्दात्मक होता है। वाणी या शब्द—(१) परा (२) पश्यन्ती (३) मध्यमा (४) वैखरी चार सोपानों पर व्यक्त होते हैं। शब्द (वाणी, वाक् तत्त्व) से पूर्णतः पृथक् 'विमर्श' संभव नहीं है। 'वर्ण' 'पद' एवं 'मन्त्र' ये तीनों शब्द के अध्व (मार्ग) हैं। 'कला' 'तत्त्व' एवं 'भुवन' ये तीन 'अर्थाध्व' हैं। इन्हीं ६ अध्वाओं (षडध्व) से समस्त जगत् की उत्पत्ति होती है। 'शब्द' एव 'अर्थ' शिव-शक्ति के रूप हैं। शब्दना-विरहित विमर्श की सत्ता संभव नहीं है। विमर्शात्मक शब्दना अपने उच्चतम शिखर पर 'परावाक्' कहलाती है। यह आन्तर शब्दना के स्वरूप वाली (स्पन्दात्मिका शब्दना) 'परावाक्' मयूराण्डरसवत् अपने भीतर समस्त वाचक एवं वाच्य (शब्दराशि) को अविभक्त रूप में अवस्थित रखती है और अहं रूप (बीजरूप) में अवस्थित है। समस्त 'मन्त्र' इसी अहमात्मक परावाक् के स्वस्वरूप हैं। 'परावाक्' 'सामान्य स्पन्द' है। सामान्य स्पन्द गतिशून्य होकर भी किंचित् चलता वाला है इसी 'परावाक्' से 'पश्यन्ती' 'पश्यन्ती' से 'मध्यमा' एवं 'मध्यमा' से 'वैखरी' का विकास होता है। 'वैखरी वाक्' में प्रसृत परावाक् अपने स्थूलतम सोपान पर आरूढ़ होती है और वैखरी वाक् के (१) पूर्व मालिनी (मातृका) एवं (२) 'मालिनी' दो स्तरों पर व्यक्त होती है। परावाक्-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरी—(१) पूर्वमालिनी—अ से क्ष पर्यन्त वर्णमाला ('स्वच्छन्द तन्त्र' में भी मान्य) (२) मालिनी—न से क पर्यन्त वर्णमाला (मालिनी विजयोत्तर आदि तन्त्रों में प्रतिपादित) ॥ मालिनी का क्रम—न, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, थ, च, ध, ई, ण, उ, ऊ, ब, क, ख, ग, घ, ङ, इ, अ, व, भ, य, उ ढ, ठ, झ, ञ, ज, ष, र, ट, प, छ, ल, आ, स, अः, ह, ष, क्ष, म, श, अं, त, ए, ऐ, ओ, औ, द, क (मालिनीविजयोत्तरतन्त्र)। पशुप्रमाता एवं पतिप्रमाता में साम्य एवं सभी अवस्थाओं में शिवत्व की व्यापकता— यस्मात् सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवः । तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥ २८ ॥ तेन शब्दार्थ चिन्तासु न साऽवस्था न यः शिवः । भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥ २९ ॥