स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः निष्यन्दः २७५ अर्थात् इदम् के रूप में प्रतीयमान यह सब जगत् आत्मा ही है। आत्मा में नानात्व किंचिन्मात्र भी नहीं है। समस्त भावों का समुद्भव आत्मा से ही होता है। संविद् के आरोहण से ही 'परा' 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' आदि वाणियों का उदय होता है और समस्त सत्तायें इसीसे सिद्ध होती है। आचार्यों ने भी कहा है कि—सभी के कारण तुम्हीं हो क्योंकि घट में मृत्तिका के समान सभी में तुम्हारा अन्वय है। जब संवित् के बिना विश्व की सिद्धि हो ही नहीं सकती—संपूर्ण विश्व संविद्—समन्वित है—तब तो असंवित् विश्व का कारण कैसे हो सकता है? संवित् ही सत् है और सत् ही संवित् है। संवित् की उपासना किये बिना वहीं संपूर्ण सत् है—यह अनुभव में नहीं आ सकता— त्वत्कारणत्वं सर्वस्मिन्नपि ज्ञातं त्वदन्वयात् । संवित्समन्विते विश्वे नाऽसंवित् कारणं भवेत् ॥ संविदायतनं ज्ञातं तत् सदाख्यां प्रपद्यते । तावतैव न लभ्या स्यादनुपासितसंविदा ॥ तथा यह भी कहा है कि— त्वदात्मकत्वं भावानां विवदन्ते न केचन । यत्प्रकाशदशां याता नाऽप्रकाशः प्रकाशते ॥ अर्थात् सभी भाव तुम्हारे ही स्वरूप है इसमें किसी का विवाद नहीं है क्योंकि सब प्रकाशित होते हैं। क्या कहीं अप्रकाश भी प्रकाशित होता है? और भी कहा गया है— 'तुम प्रकाशक एक ही हो। सर्जन भाषण और बोधन-ये तीनों तुम्हारे प्रकाश हैं। तुम अन्य प्रकाशों से व्यतिरिक्त हो, जैसे दूसरे प्रकाशक सूर्य आदि। किन्तु तुम्हारे प्रकाश के उदय के बिना कोई दूसरा प्रकाश प्रकाशित नहीं हो सकता। श्रुति, पंचरात्र भी तो यही कहते हैं कि वहाँ सूर्य चन्द्र आदि का प्रकाश नहीं है। उसी के प्रकाश से यह सब प्रकाशित हो रहा है— 'सृजन् वदन् ज्ञापयंश्च त्रिधैकस्त्वं प्रकाशकः । व्यतिरिक्तः प्रकाशेभ्यो न यथाऽन्ये प्रकाशकाः । न प्रकाशाः प्रकाशन्ते त्वत्प्रकाशोदयं विना ॥' पंचरात्र में भी कहा गया है कि—'न तत्रादित्यो भाति' अर्थात् वहाँ सूर्य-चन्द्रादि प्रकाश नहीं है। उसी के प्रकाश से यह सब प्रकाशित हो रहा है। संवित् सर्वमय है—इसका अन्य उदाहरण भी है। जितने संवेद्य हैं वे संवेदनरूप अनुभव के द्वारा ही संविदित होते हैं। उनसे तादात्म्य होता है। तद्भावरूपता होती है और अभेद का संवेदन होता है। 'स्वात्मसप्तति' में कहा गया है—सभी वस्तुएं ज्ञानस्वभाव का ही विषय होती हैं और उसके साथ तादात्म्य प्राप्त हो जाती है। जीव ज्ञान स्वरूप है अतः वह सर्वमय है—