स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 390, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयः निष्यन्दः २८९ उपर्युक्त रीति से क्रीड़ापरायण होकर स्वपरिकल्पित भय क्रोध शोक के कारणभूत भावप्रतिच्छकों के द्वारा क्रीड़ा करता हुआ तद्याथात्म्य को जानकर कालुष्य से भय आदि विकारों के कालुष्य से स्वल्पमात्र भी दुष्प्रभावित नहीं होता एवं भावों को स्वस्वभाव शक्ति का विजृंभण मात्र मानकर याथात्म्यवेदी होकर स्वल्पमात्र भी विकारग्रस्त नहीं होता वह जगत् एवं उसके समस्त व्यापारों को अपनी क्रीड़ा मानकर जीवितावस्था में ही मुक्त हो जाता है ।१ भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं— 'एवं स्वभावं यस्य चित्तं' यथा 'मन्मयमेव जगत् सर्वम् इति'—स सर्वं क्रीडात्वेन पश्यन् नित्ययुक्तत्वात् जीवन्नेव ईश्वरवत् मुक्तो, न त्वस्य शरीरादि बन्धकत्वेन वर्तते ।।'२ अर्थात् जिस योगी के चित्त का इस प्रकार का स्वभाव विकास हो उठा हो कि— 'यह निखिल विश्व मेरा अपना ही स्वरूप है'—वह संपूर्ण प्रमेयात्मक जगत् को अपने क्रीडनक (खिलौने) के रूप में देखता हुआ नित्ययुक्त (स्वरूप सत्ता से निरन्तर आश्लिष्ट) होने के कारण षाटकौशिकक्षर काया में रहता हुआ भी ईश्वर के समान मुक्त रहता है । ऐसे प्रबुद्ध योगी के लिए उसके शरीरादिक बन्धनरूप नहीं रहा करते ।। संवेद्य विषयों के प्रकार—आत्मा वेदक है और उसके संवेदन के विषय वेद्य (संवेद्य) पदार्थ है । इनके दो प्रकार है— (१) पाञ्चभौतिक विषय (२) भावात्मक विषय । (१) पाञ्चभौतिक विषय—विषयों के वे प्रकार जो कि पृथिव्यादिक पञ्चभूतों से निर्मित हैं—बाह्येन्द्रियों से ग्राह्य हैं: स्थूल शरीर एवं उनके अनेक संघटक भौतिक अंग । (२) भावात्मक विषय—ये शरीरांग युक्त कोई काया नहीं है प्रत्युत् अमूर्त भाव हैं—संवेदनों, भावनायें, संवेगों, विचारों, अनुभूतियों अमूर्त भाव हैं—संवेदनायें, भावनायें, संवेगों, विचारों, अनुभूतियों के अमूर्त अस्तित्व हैं यथा-सुख, दुःख, मान, अपमान, धर्म, अधर्म, जय, पराजय, आह्लाद, निराशा आदि ।। इन्हें 'भावाभाव' के आधार पर भी विभक्त कर सकते हैं यथा— (क) भावात्मक विषय—जगत् में भावसत्ताक पदार्थ यथा—घट, पट, शरीर, इन्द्रियाँ, सुख, दुःख, अमर्ष, हर्ष आदि ।। (ख) अभावात्मक विषय—जगत् में अविद्यमान पदार्थ यश—वन्ध्यापुत्र, खपुष्प, शश-विषाण, सर्प-कर्ण आदि ।। संवेदन की विशेषता—(१) संवेदन में मूर्तामूर्त दोनों विषयों की समान अनुभूति होती है । (२) संवेदन में समस्त अनुभूतियाँ भावात्मक ही हुआ करती हैं अभावात्मक नहीं । (३) जो कुछ संवेदन के विषय हैं उन्हीं का अस्तित्व होता है अन्य का नहीं । १. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) । २. स्पन्दसर्वस्व (स्पन्दकारिकावृत्ति) । स्पं० १९