स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९६ स्पन्दकारिका स्वरूपसंबोधदानात्मको भेदमय बन्धक्षपणलक्षणश्च संस्कार विशेषः ॥'—इस प्रकार की वह दीक्षा 'निर्वाण दीक्षा' कहलाती है। यही संवित्—'शिवसद्भावदायिनी' है। 'शिवसद्भावदायिनी'—स्वस्वभाव परमेश्वर शिव का जो सद्भाव (सत्ता) है। (जिसके द्वारा 'अहमेवास्मि' : 'मैं ही हूँ' का भाव जाग्रत होता है) उसकी अबाधित प्रतिपत्ति (जो कि सिद्धावस्था में आविर्भूत होती है) को देने वाली (प्रतिपादिका)। यह दीक्षा और कैसी है?— (१) वह सुप्रबुद्ध गुरु को गोचर एक निरुत्तर संस्कार है। (२) वह परमशिवात्मकरूप प्राप्तिमात्र है। (३) वह बाह्यसाधनसाध्यविधिविशेषात्मक नहीं है। कहा भी गया है—'इयमेव सा मिथ्याज्ञानशून्यस्य' ।१ तदात्मतासमापत्ति : योगी का देव-तादात्म्य मन्त्रदेवता और चित्त— आत्म चैतन्य का अविराम अनुसंधान करते रहने पर योगी का संकल्प, उसकी उत्कण्ठा, उसकी भावात्मक तीव्रता इतनी प्रबल हो जाती है कि मन्त्रोच्चारण करने के क्षण ही उसका चित्त ध्येय देवता के साथ तादात्म्य प्राप्त कर लेता है। उसकी यह तीव्र एकाग्रता ही उसे शिवत्व प्रदान कर देती है। भट्टकल्लट कहते हैं—'तत्सवेदनद्वारेण यः तदात्मग्रहो मन्त्रन्यासात्मकः स एवो- दयः तस्य ध्येयस्य मन्त्रात्मनः साधकचेतसि, तादात्म्यं तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य मन्त्रोच्चारणेच्छया संपादिता ।।' 'तदात्मतासमापत्ति'—शिवत्व प्रदान करने के मार्ग में 'अशुद्धि' (का०क्र० ९) तथा 'क्षोभ' (का० क्र० ९) ही प्रधान प्रतिबन्धक (प्रतियोगी) तत्त्व हैं। पुर्यष्टक देह, प्राण, मन आदि की भूमिका नगण्य है (यदि 'अशुद्धि' एवं 'क्षोभ' का अभाव हो जाय)। इन अशुद्धियों में भी 'कार्ममल' सर्वाधिक प्रतियोगी (विपरीतगामी) तत्त्व है। उत्पल- देवाचार्य कहते है— 'देवादीनां च सर्वेषां, भविनां त्रिविधं मलम् । तत्रापि कार्ममेवैकं, मुख्यं संसारकारणम् ।।'२ इस 'स्पन्दसूत्र' में यह कहा गया है कि— (१) देवता का साक्षात्कार 'ध्याता' को होता है अर्थात् देव-साक्षात्कार के लिए 'ध्यान' प्रमुख तत्त्व है अतः 'देवोदय' के लिए प्रथमतः ध्यान-साधना आवश्यक है। (२) किसी भी ध्यानयोगी को अपने इष्टदेवता का प्रथम साक्षात्कार केवल उसके ध्यानप्रवण चित्त में ही होता है। योगसूत्र में कहा गया है ऐसे साक्षात्कार 'मूर्धा' की 'ज्योति' में हुआ करते हैं—'मूर्ध्नि ज्योतिषि' ।। (३) यह साक्षात्कार 'संवेदन' (भट्टकल्लट के मत में) एवं 'ध्यान' (कारिकाकार १. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति' । २. प्रत्यभिज्ञाकारिका—उत्पलदेव ।