भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 418

तृतीयः निष्यन्दः ३१७ पदद्वय में जो योगी यथोक्त संवित्ति में समाधान (एकाग्रता, ब्रह्म में मन को लगाना) के अपरित्याग से जो उत्थित हुआ हो उस सर्वथा स्वतन्त्र, सर्वकर्ता स्वात्मा में सुव्यवस्थित योगी के लिए सृष्टिस्वभाव रूप पदद्वय (जागृति-स्वप्न) शक्ति को प्रतिबंधित नहीं करता जो व्यक्ति इससे विपरीत अर्थात् 'अन्यथा' जीवन बिताता है तब सांसारिक प्राणियों की भाँति आत्मगत भावसृष्टि के द्वारा परवश बन जाते हैं- 'लोकवन्निजयेव भावसृष्ट्या पर वशीक्रियते ।।' इसीलिए कहा गया है- 'अन्यथा स्वरूपस्थित्यभावे' ।१ भट्टकल्लट स्पन्दकारिकावृत्ति में इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं- 'अन्यथा तु स्वरूपस्थित्यभावे स्वतन्त्रा स्यात् स्वप्ने आलम्बिडालदर्शनरूपा सृष्टिः, यस्मात् तत्तत्त्व सृष्टिस्वभावं प्रसवधर्मत्वात् यथा सततं सर्वस्य लोकस्य जाग्रद्वृत्तौ स्वप्नावस्थायां च सम्बन्धा सम्बन्धविकल्पाः ।।'२ स्वबल का महत्व- यथा ह्यर्थोऽस्फुटो दृष्टः सावधानेऽपि चेतसि । भूयः स्फुटतरो भाति स्वबलोद्योगभावितः ॥ ३६ ॥ यथा यत् परमार्थेन येन यत्र सदा स्थितम् । तत्तथा बलमाक्रम्य न चिरात् सम्प्रवर्तते ॥ ३७ ॥ जिस प्रकार किसी व्यक्ति को कोई दूर देश-स्थित पदार्थ, चित्त के सावधान होने पर भी, प्रथम दृष्टि में स्पष्टतया दृष्टिगत नहीं होता है, किन्तु आत्मबल का प्रयोग करके देखने पर उसको वही पदार्थ सुस्पष्ट रूप में दृष्टिगत होने लगता है । उसी प्रकार योगी के लिए स्पन्दात्मक आत्मबल पर आरूढ़ होने की स्थिति में, स्वल्प समयावधि में ही समस्त पदार्थ, जो जिस समय, जिस देश और जिस आकार-प्रकार में विद्यमान हों, ठीक उसी अवस्था में बोध का विषय बन जाते हैं ॥ ३६-३७ ॥

  • सरोजिनी * अर्थोऽस्फुटो = दूरस्थित अस्पष्ट कोई पदार्थ, स्वबलोद्योग = प्रयत्नविशेष । बलमाक्रम्य = स्वबलं स्वस्वरूप का आश्रय लेकर । अचिरेण = बिना बिलम्ब के सामान्य व्यक्ति एवं योगी की तुलना की गई है । जिस प्रकार यदि कोई व्यक्ति किसी पदार्थ को प्रथम दृष्ट्या देखता है तो उसे वह अस्पष्ट दिखाई पड़ता है किन्तु विशेष प्रयत्न करने पर वह उसे सुस्पष्ट दिखाई पड़ने लगता है । उसी प्रकार यदि योगी भी आत्मबल का प्रयोग करता है तो उसे स्वल्प काल में ही उन पदार्थों का ज्ञान हो जाता है । आक्रम्य = अपनी आत्मा में विलय कर लेने पर । यत्र = जहाँ शङ्करात्मा स्वस्वभाव में । आक्रम्य = पकड़कर । यथा = जिस प्रकार । अभेद व्याप्ति के द्वारा । १. रामकण्ठाचार्य- 'स्पन्दविवृति' । २. भट्टकल्लट- 'स्पन्दसर्वस्व' ।