भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 422

तृतीयः निष्यन्दः ३२१ (१) 'यथा किल दूरस्थित' (२) 'यथा तेनैव प्रयत्नविशेषेण' ।१ आत्मबल का स्पर्श = 'स्वबलोद्योग'— 'सामान्य स्पन्द' ज्ञान का अनन्त रत्नाकर है। उसके संस्पर्श मात्र से चित्त के साथ समस्त ज्ञानेन्द्रियों में भी वह बिलक्षण सामर्थ्य आयत्त हो जाती है जिससे कि वे अस्पष्ट विषयों को भी सुस्पष्ट रूप में एवं उनके अपने गुह्य स्वस्वरूप में देख लेते हैं। 'स्पन्द शक्ति' की इस आकस्मिक गतिमयता को जो कि शम्पावत अकस्मात आती है— 'आत्मबल का स्पर्श' कहलाती है। स्पन्द शक्ति की यह गतिमयता प्रत्येक काल में, प्रत्येक क्षण आन्तरिक रूप से प्रवाहित होती रहती है किन्तु प्राणियों को इस रहस्य का बोध नहीं रहता। योगियों को इसका बोध रहता है। वे इस मध्यवर्ती स्पन्द स्पर्श (आत्म बल) को ग्रहण कर लेते हैं। अतः उनकी संकल्पशक्ति में तीव्रता की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है। परिणाम यह होता है कि योगी एकाग्रता की स्वल्प मात्रा में भी भूत, भविष्य एवं सुदूरस्थ पदार्थों, दृश्यों एवं अवस्थाओं को यथास्वरूप यथाकांक्ष स्वल्पावधि में जान लेते हैं या देख लेते हैं। वृत्तिकार भट्टकल्लट कहते हैं— जिस प्रकार चित्त के सावधान रहने पर भी, किसी भी व्यक्ति को कोई दूरस्थित पदार्थ प्रथम दृष्टि में स्पष्टतः दृष्टिगत नहीं होती किन्तु तत्क्षण ही आत्मबल का प्रयोग करके उसको देखने पर वही पदार्थ स्पष्टतर रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है उसी प्रकार योगी को भी स्पन्दस्वरूप आत्मबल पर अवस्थित होने की अवस्था में स्वल्पकाल में ही वे समस्त पदार्थ, चाहे वे जिस समय, जिस देश एवं जिस आकार-प्रकार में भी स्थित हों ठीक उसी अवस्था में ज्ञान के विषय बन जाते हैं ।। भट्टकल्लट कहते हैं कि जिस प्रकार किसी भी व्यक्ति को कोई भी दूरस्थित पदार्थ चित्त के एकाग्र न रहने पर प्रथम दृष्टि में स्पष्टतया दृष्टिगत नहीं होता किन्तु 'तत्क्षण ही आत्मबल या प्रयत्न विशेष के द्वारा वही पदार्थ स्पष्टतर रूप में दृष्टिगत होने लगता है। ठीक उसी प्रकार स्पन्दात्मक भूमिका पर अवस्थित योगी को उसी प्रकार का विशेष प्रयत्न करने पर स्वल्पावधि में ही उन समस्त पदार्थों का उसी प्रकार साक्षात्कार होने लगता है जिस रूप, जिस स्थान, जिस आकार एवं जिस स्थान में वे विद्यमान हों। इसका कारण क्या है? कारण यह है कि उस योगी के स्वरूप पर से तामसिक आवरण हट चुका है फलतः योगियों के लिए भूत-भविष्य (अतीतानागत) पदार्थों का यथार्थ रूप में बोध होना स्वाभाविक है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। भट्टकल्लट अपने शब्दों में इस प्रकार कहते हैं— (१) 'यथा किल दूरस्थितः कश्चिदर्थः पुरुषेण पूर्वं सावधानेनापि न लक्ष्यते स एव स्फुटतरो भवति, प्रयत्नविशेषेण निरूप्यमाणस्तत्रैव स्थितस्य' ।।३६।।—'स्पन्दसर्वस्व' ।।२ १. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' २. भट्टकल्लट स्पं० २१