स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३५९ परिज्ञान एवं अनुभव न हो । ‘मालिनीविजयोत्तरतन्त्र’ के ‘उत्तरमालिनी क्रम’ के अनुसार— वर्ण एवं तत्त्व— (१) ‘क’ = अन्तिम वर्ण ॥ = पृथ्वी तत्त्व ॥ (२) द से झ = २३ वर्ण = जल से पदार्थतक २३ तत्त्व ॥ (३) च से अ = १४ वर्ण = पुरुष से माया पर्यन्त तत्त्व । (४) इ से घ = ३ वर्ण = शुद्धविद्या, ईश्वर, सदाशिव ॥ (५) घ से न = १६ वर्ण = शिव तत्त्व ॥ शक्तिपात या परमात्मानुग्रह प्राप्त योगियों को ये शाब्दी शक्तियाँ शब्दराशि में निहित शाक्तबल का अनुभव कराकर शिव भाव पर भी पहुँचाती हैं । वाणी ही मनुष्य का विनाश भी करती है और विकास भी-उन्नति भी अधःपतन भी । भट्टकल्लट को ‘मालिनी क्रम’ स्वीकार्य नहीं था । उन्होंने मातृका क्रम ही स्वीकार किया ॥ भट्टकल्लट की व्याख्या—(‘स्पन्दसर्वस्व’)— शब्दराशि = अकारादिक्षकारान्तवर्णमाला । समुत्थस्य = तत्समुद्भूतस्य शक्ति- वर्गस्य = कादिवर्गात्मकस्य ब्राह्म्यादि शक्ति समूह का । भोग्यताम् = ‘भोग्यतां गतः पुरुषो’ ॥ कलाविलुप्तविभवो = ब्राह्म्यादीनां कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्त विभवः स्वस्वभावात् प्रच्यावितः पशुरुच्यते ॥ कला = ककारादि हकारान्त समस्त स्वर-व्यञ्जन समुदाय = ‘कला समूह’ ॥ कलासमूह ने शिव की स्वात्मशक्ति (स्वातन्त्र्य शक्ति) को छीनकर जीव को दरिद्र बना दिया है । शब्दराशि = मातृका (अकारादिक्षकारान्त वर्णसमाम्नाय) ॥ ‘मातृकाशक्ति’ अशेष भेदयुक्त वाच्यवाचकस्वरूप स्थूल शब्द समूह को अपने सुक्षि में अभेदात्मना (स्पन्दनमय विमर्श मात्र के रूप में) धारण किए हुए ‘पराशक्ति’ के रूप में अवस्थित है । यह ‘पराशक्ति’ (परावाक्) पूर्णाहन्तास्वरूपा ‘स्वातन्त्र्यशक्ति’ ही है— ‘स्वातन्त्र्यशक्ति रे वास्य सनातनी पूर्णाहन्तारूपा ॥ (स्पन्दनिर्णयः ३.१३) शब्दराशि क्या है? ‘साहि भगवती अशेष-वाच्यवाचकात्मक जगद्भेद चमत्का- रात्मक शब्दराशि विमर्श परमार्था (स्वच्छन्द तन्त्र ११.१९९) । शब्दराशि ही ‘मातृका’ के नाम से भी अभिहित की जाती है क्योंकि ‘अज्ञाता माता मातृका विश्वजननी’ (शिव सूत्रविमर्शिनी १.४) यह अज्ञाता है और विश्वमात्रा—जगत- प्रसविनी है । पराशक्ति (परावाक् के रूप में व्यक्त होकर एवं अपना प्रसार करती हुई) अ से क्ष पर्यन्त समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म वर्ण समूह का प्रसार करके अनन्त वाच्यों एवं अनन्त वाचकों वाले विश्व को अवभासित करती हुई स्थित है । ‘विमर्श शक्ति’ ही अपने