भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 519 में से

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पृष्ठ 466

वैखरी वाक बन जाती है ३६ तत्त्वों का बहिर्मुखी अवभासन प्रारंभ । यह समस्त व्यापार = 'परामृतरसापाय' है । परामृत = शिव । रस = शक्ति ॥ मायाशक्ति के उल्लसाभाव के स्तर के (१) सदाशिव (२) ईश्वर (३) शुद्ध- विद्या—'परामृत' कहे जा सकते हैं प्रत्ययोद्भव—माया । कला । विद्या । राग । नियति । काल = (षटकंचुक) ॥ पशु = षट्कंचुकपाशपाशित जीव । प्रत्ययोद्भव—तन्मात्रपंचक शाक्त प्रसरण की क्रीड़ा—शिवभाव से जड़भाव पर्यन्तः ३६ तत्त्वों तक ॥ व्यतिरिक्त साधन-सामग्री की अपेक्षा रखने वाला एवं उन सामग्रियों द्वारा अपनी समस्त इच्छाओं (समीहितार्थों) को पूरा करने वाला व्यक्ति वह भाव प्राप्त करता है । जागर-स्वप्न-सुषुप्ति अवस्थाओं से उपमेय—'सकल' 'विज्ञानाकल' एवं 'प्रलयकेवली' नामक योगित्रय सहजादिक मलत्रय से आवृत होकर 'पशु' बन जाता है— ('जागर-स्वप्न-सुषुप्त्यावस्थोपमेय सकल-विज्ञानाकल-प्रलयकेवलाख्य भेदत्रय योगी सहजादिमलत्रयावृतः पशुर्भवति इत्यर्थः'—) क्योंकि उसका प्रत्ययोद्भव ही अमृत- रसापाय है—'परामृतरसापायः ।।' परमाम्ृतरसापायः—'परम्' = अनुत्तर । अमृत = अविनाशी अद्वय, चिन्मय, शिवस्वरूप । रस—उसका रस ॥ रसः = तथाप्रत्यवमर्शात्मक आस्वाद । अपाय = उससे होने वाला अपाय (पृथग्भाव) अन्यथा वृत्ति—अर्थात् 'इदम्' इत्यादिविकल्प- रूपात्मक ॥ तस्य = उस पशु का ('स्पन्दप्रदीपिका') प्रत्ययोद्भवः = 'श्रोत्रादिद्वारेण विषय- दर्शने स्मरणादिज्ञानोत्पत्तिः' (स्पन्दप्रदीपिका') स एव 'परामृतरसात्'—स्वरूपोदयात् अपायः = प्रच्युतिः । यतः 'सः' पुमान् तेनास्वतन्त्रतां (पारतन्त्र्यं असर्वगतादिम्) एति = प्राप्नोति । स च 'प्रत्ययोद्भवः तन्मात्रगोचरः ॥ = 'शब्दादिविषय विषयः' तदभिलाषा- त्मक ॥ (स्पन्दप्रदीपिका) ॥ एक ही परमतत्त्व की स्वेच्छा-परिकल्पित अनुग्राह्य-अनुग्राहक भावों की पृथक्- पृथक् विचारणा से विविक्त आत्मा ही अनुग्राह्य है । 'परामृत' का क्या अर्थ है? (१) शिव-शक्ति-सदाशिव-ईश्वर-विद्या आदि के रूप में पंचधा परिकल्पित विभागाभास को प्रक्रिया शास्त्रों में 'परामृत' 'रस' आदि शब्दों द्वारा कहा गया है । (२) 'अहं' अत्यन्त भेदसंस्पर्श से शून्य 'परमशिव' नामक स्वभाव का वाचक होने के कारण 'परामृत' कहा जाता है । वह— परामर्शरूप शक्तितत्व का वाचक है अतः उसे 'रस' भी कहा गया । वह अत्यन्त प्रशान्त निष्परामर्श शून्यप्राय कहा गया है । यह मत शिवतत्त्ववादियों का मत है । उसका निरास करने हेतु ही यहाँ 'रस' शब्द प्रयुक्त किया गया है ।

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