भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 519 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 477

३७६ स्पन्दकारिका दूसरा कार्य, एक स्रष्टा है दूसरा सृष्टि एवं कारण है तो दूसरा कार्य है। शब्द की गोद में उसके अर्थ—खंग, उदक, आदर्श (दर्पण) आदि पदार्थ—स्थित हैं—ये पदार्थ 'शब्द' के अवभास मात्र हैं— 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा । प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि स्फटिकादिजडोपमः ॥' (प्रत्यभिज्ञा) अन्यत्र भी कहा गया है— 'न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगं विना । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥' और वह सर्वाच्छेद-विरहित-विशुद्ध-चित्रप्रकाशात्मक मुख्यार्थनिष्ठ होकर प्रत्यव- मर्श कहलाता है—'स च सर्वाच्छेदविरहितविशुद्ध चित्रप्रकाशात्मक मुख्यार्थनिष्ठः सन् प्रत्यवमर्श इत्युच्यते ॥' 'विकल्प' क्या है? जाति गुण क्रिया आदि अभिधानादिक विविध विशेषावच्छिन्न भिन्नरूपात्मक विश्वात्मकार्थावभासनिष्ठ ही विविध कल्पनात्मक होने के कारण 'विकल्प' कहलाते हैं— 'जाति गुण क्रियाभिधानादिविविध विशेषावच्छिन्नभिन्नरूपविश्वात्मकार्थावभासनिष्ठ- स्तु, विविधकल्पनात्मकत्वात् विकल्प इत्युच्यते ॥' वही शब्द का मुख्य रूप है—'तदेव शब्दस्य मुख्यं रूपं ।' उसके संकेतत्व द्वारा व्यवस्थित, श्रोत्रग्राह्य ध्वनिविशेषात्मक अर्थ ही प्रायः 'शब्द' के नाम से व्यवहियत किया जाता है— 'तत्संकेतत्वेन व्यवस्थितः श्रोत्रग्राह्यो, ध्वनिविशेषात्मकोऽर्थ एव प्रायेण शब्द इति व्यवहियत े ॥' अतः शब्दरूपतापन्न, एवं प्रत्ययोद्भवप्राणभूत शक्तियाँ ही इस स्वरूपावरण करने के कार्य में सदोद्युक्त रहा करती हैं—'तस्माच्छब्दरूपतामापन्नाः प्रत्ययोद्भवप्राणभूताः शक्तय एवास्य स्वरूपावरणे सदोद्युक्ता' । पशु = 'शक्तिवर्गस्य भोग्यतां गतः सन् पशुः स्मृतः ॥' कहा भी गया है—स्वरूपस्य स्वस्वभावस्याच्छादने ॥'१ स्वरूपावरण : बन्धन—(१) ब्राह्मी आदि शब्दाधिष्ठात्री शक्तियाँ जीवों के स्वरूप पर आवरण डालने हेतु सदैव उद्यत रहती है 'स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः' । (२) 'शब्दानुवेध' (प्रत्ययों में शब्दानुस्यूतता) के बिना प्रत्ययों का आविर्भाव संभव ही नहीं है—'यतः शब्दानुवेधेन न बिना प्रत्ययोद्भवः ॥' भट्टकल्लट की व्याख्या—'स्पन्दसर्वस्व' में वृत्तिकार कहते हैं कि—'स्वरूप' अर्थात् स्वभाव के आच्छादन में पुरुष की ब्राह्मी आदि शक्तियाँ सदैव उद्यत रहती हैं। १. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति' ।