भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 480

तृतीयः निष्यन्दः ३७१ जो शाब्दी शक्तियाँ पशुप्रमाताओं को बन्धन में डालती हैं वे सदैव बन्धन का कारण ही नहीं बनती प्रत्युत्— 'पूर्णप्रमाता, परिमितप्रमाता तथा उसके अन्तःकरण, बाह्यकरण एवं प्रमेयगत वामेश्वरी आदि शक्तियाँ ज्ञात होने पर मुक्ति देने वाली और अज्ञात होने पर बन्धन प्रद बन जाती है— 'पूर्णावच्छिन्नमात्रन्तर्बहिष्करणभावगाः । वामेशाद्याः परिज्ञानाज्ञानात् स्युर्मुक्तिबन्धदाः ॥'१ निखिलजगदात्मा एवं संविदात्मा महेश्वर अपनी स्वरूप गोपन क्रीड़ा द्वारा 'अणु' बन जाता है— 'इत्थं सर्वशक्तियोगेऽपि आभिर्मुख्याभिः शक्तिभिरुच्यते, स च भगवान् स्वातन्त्र- शक्ति महिम्ना स्वात्मानं संकुचितमिव आभासयत अणुः इति ॥'२ 'मायीयमल'–स्वरूपावरण को ही शब्दान्तर में 'मायीय मल' भी कहते हैं— 'जब ज्ञान शक्ति क्रमश संकुचित होकर भेद दशा में, सर्वज्ञता से अल्पज्ञत्व प्राप्त करती है और अन्तःकरण तथा ज्ञानेन्द्रियता की प्राप्ति के साथ अत्यन्त संकोच ग्रहण करती है तब उसको देहादिक भिन्न-भिन्न का वेद्यों का विकास रूप 'मायीय मल' कहते हैं'— (१) 'ज्ञानशक्तिः क्रमेण संकोचात् भेदे सर्वज्ञत्वस्य किंचिज्ज्ञत्वाप्तेः अन्तःकरण- बुद्धीन्द्रियतापत्ति पूर्वं अत्यन्तं संकोचग्रहणेन भिन्नवेद्यप्रथाप्रथारूपं मायीयं मलम् ॥'३ (२) उत्पलदेवाचार्य 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' में कहते हैं— 'भिन्नवेद्य प्रथात्रैव मायाख्यं जन्मभोगदम्' ।४ 'भिन्नवेद्यजुषां मायामलं विद्येश्वरायश्च ते ॥'५ 'कर्तृत्वयोगेऽपि बोधानां कार्मोत्तीर्णानां विद्येश्वराख्यानां भिन्नवेद्यभाक्त्वेन माया मलम् ॥'६ 'मायीयमल' एवं 'आणवमल' में भेद है कि—'जब चिदात्मा परमेश्वर अपने स्वातन्त्र्य से अभेद व्याप्ति को संकुचित करके भेद व्याप्ति का अवलम्बन ग्रहण करते हैं तब उनकी इच्छादिक शक्तियाँ असंकुचित होने पर भी संकुचित प्रतीत होती हैं तभी यह मलों से आवृत होकर संसारी हो जाता है और अप्रतिहत स्वातन्त्र्यरूप इच्छाशक्ति संकुचित होकर अपूर्णामन्यतात्मक आणवमल कही जाती है ।'— 'यदा चिदात्मा परमेश्वरः स्वस्वातन्त्र्यात् अभेदव्याप्तिं निमज्ज्य भेदव्याप्तिम् अवलम्बते, तदा 'तदीया इच्छाशक्तयः' असंकुचिता अपि संकोचवत्यो भान्ति, तदानीमेव च अयं मलावृतः संसारी भवति तथा च अप्रतिहत स्वातन्त्र्यरूपा इच्छाशक्ति संकुचिता सती अपूर्णाम्मन्यतारूपम् आणवं मलम् ॥'७ १. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' (भट्टदामोदर का उद्धरण) । २. 'जन्ममरणविचार'—वामदेव। ३. क्षेमराज—'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' । ४. 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' । ५. 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' । ६. 'प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति' । ७. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्'