स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 498, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३९७ (१) जब साधक स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से किसी एक में स्थित रहते हुए वहीं अपने चित्त को लीन करके, अन्तर्बहिःप्रदेश में एकाकार स्पन्दतत्त्व का आत्मानुभव प्राप्त कर लेता है तब स्वातन्त्र्यपूर्वक प्रत्ययोद्भव के सृष्टि एवं संहार को निष्पादित करता हुआ अपनी पूर्व लुप्त भोक्तृत्व पदवी प्राप्त कर लेता है फिर वह शक्तिचक्र का ईवर (स्वामी) बन जाता है। (२) प्रत्यभिज्ञाहृदयम् में कहा गया है— 'तदा प्रकाशानन्दसारमहामन्त्रवीर्यात्मकपूर्णांहन्तावेशात् सदा सर्वसर्गसंहारकारिनिज- संविद्देवताचक्रेश्वरता प्राप्तिर्भवतीति शिवम् ॥'१ अर्थात् तब प्रकाशानन्दसार महामन्त्रवीर्यात्मक पूर्णांहन्ता के साथ अभेद होने से सदा सब प्रकार की सृष्टि एवं लय करने वाली अपनी संवित् शक्तियों पर प्रभुत्व स्थापित हो जाता है। (३) शिवत्व प्राप्त करने हेतु पशु को किसी नव्य वस्तु की शोध नहीं करनी पड़ती और न तो कोई विलक्षण उपलब्धि प्राप्त करनी होती है। क्योंकि शिवत्व पशु का अपना स्वभाव है। हाँ वह अपना स्वभाव ही भूल जाता है और इसीलिए बन्धन में पड़ जाता है किन्तु स्वरूप का परामर्श होते ही वह पुनः शिव बन जाता है— 'शिवत्वमस्य योगिनो न अपूर्वम्, अपितु स्वभाव एव, केवलं माया शक्त्युत्था- पितस्वविकल्पदौरात्म्यात् भासमानमपि तत् नायं प्रत्यवम्रष्टुं क्षमः ॥'२ इस मुक्ति की प्रक्रिया के दो चरण हैं—(१) बोध का उदय ('शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं' की प्रत्यभिज्ञा) (२) अबोध का अन्त (अनात्मकता में आत्मभाव की अनुभूति का उच्छेद) या प्रतिबन्ध की निवृत्ति ॥ इस सिद्धावस्था में योगी स्वातन्त्र्य एवं शक्ति चक्र का स्वामी बन जाता है— चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति हो जाती है—खोयी हुई शक्तियाँ पुनः प्राप्त हो जाती हैं—और यही है निर्वाण, मुक्ति, जीवन्मुक्ति, मोक्ष एवं चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति। शैवदर्शन की मुक्ति की विलक्षणताएँ— इस दर्शन के अनुसार मुक्ति किसी उत्कृष्टतर देवलोक, शिवलोक, गोलोक, वैकुण्ठ लोक, साकेत आदि की प्राप्ति नहीं है। प्रत्युत् मुक्ति— (१) अपने सत्स्वरूप = परमार्थस्वरूप = या शिवत्व की प्रत्यभिज्ञा है। (२) (यह स्वर्गलोक या मुक्ति धाम की प्राप्ति नहीं है प्रत्युत्) यह स्वस्वरूपा- वस्थान है न कि कोई उत्क्रान्ति। (३) यह स्वस्वरूप पर चढ़े आवरण को हटाना मात्र है। (४) समस्त जगत् को अपना क्रीड़ांगन मान कर एवं विश्व के प्रत्येक पदार्थ को १-२. प्रत्यभिज्ञाहृदयम्।