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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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सदसदनुभय से परे भी मानकर ‘अनिर्वचनीय’ भी कहा है। इसे ब्रह्म से असमवेत एवं जड़ माना है। यह सांख्य की प्रकृति की जड़ता से ग्रस्त है और मात्र अज्ञान भी उद्भाविका है यह सृष्टि-व्यापार की संचालिका आदि भी है किन्तु पारमार्थिक सत्य नहीं है। ‘स्पन्द’ एवं प्रत्यभिज्ञा दर्शन में ‘माया’ भी चिद्रूपा स्वातंत्र्य शक्ति का अवरोहणात्मक रूप है। चितिशक्ति ही—‘ज्ञान, क्रिया’ एवं ‘माया’ बन जाती है। ज्ञान, क्रिया एवं माया ही सत्व, रज एवं तम बन जाते हैं। भगवान् की ‘क्रियाशक्ति’ (सर्वकर्तृत्व) अल्पकर्तृत्व बन जाती है और ‘कार्ममल’ का प्रसव करती है। ‘सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व एवं व्यापकत्व ‘कला’ ‘विद्या’ ‘राग’ ‘काल’ एवं ‘नियति’ (पञ्चकञ्चुक) बन जाते हैं। संवित् ही प्राण बन जाता है—‘प्राक् संवित् प्राणे परिणता’ ‘न सावस्थान यः शिवः’ (स्पन्दकारिका) ऐसी कोई अवस्था ही नहीं है जो शिव न हो। वाक् तत्त्व, अहन्ता और विश्व में तादात्म्य—‘अहन्ता’ समस्त मन्त्रों के उदय. और विश्रान्ति के स्थान भी हैं यह महती वीर्यभूमि है। (प्र०हृ०) परमात्मा और स्वात्मा तथा जगत् एक ही सत्ता के विभिन्न रूप हैं। आचार्य क्षेमराज कहते हैं—‘श्री परमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं’ (सूत्र ४ की व्याख्या) ‘अहं’ में ‘इदम्’ के अवस्थान की विभिन्न स्थितियाँ— १. ‘सदाशिवतत्त्व’ में—अहन्ताच्छादित और अस्फुट इदन्तात्मक ‘परापर विश्व’ ग्राह्य है। (सदाशिव भट्टारकाधिष्ठित ‘मन्त्रमहेश्वर वर्ग प्रमाता परमेश्वरेच्छा’ कल्पित है)। २. ‘ईश्वरतत्त्व में—स्फुट इदन्ता और अहन्ता का सामानाधिकरण्य जैसा विश्व ग्राह्य है (ईश्वरभट्टारक से अधिष्ठित ‘मन्त्रेश्वर वर्ग’ ग्राहक है)। ३. ‘विद्यापद’ में—श्रीमदनन्तभट्टारक से अधिष्ठित मन्त्ररूप ग्राहक है और भेदात्मक विश्व ग्राह्य है। शुद्ध विद्याः सामानाधिकरण्यं च सद्विद्यामिदं धियोः। (ईश्वर- प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (३।१) सामनाधिकरण्य रूप है)। स्वतन्त्र चिद्घनसंवित्स्वरूप, अनुत्तरविग्रह, परमेश्वर जब अपनी स्वातन्त्र्यशक्ति द्वारा, अखिल जगत् की रचना के लिए किंचित् चलानात्मक दशा का अनुभव करते हैं तो उस प्रथम ‘स्पन्द’ को ही तत्त्वज्ञ ‘शिवतत्त्व’ कहते हैं— ‘यदद्यमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छयाऽखिलमिदं जगत्स्रष्टुम्। मन्त्रवर्णात्मकाः सर्वे सर्वे वर्णाः शिवात्मकाः ॥’ ‘नादसिद्धान्त’— चित्प्रकाश से अभिन्न, नित्योदित, महामन्त्ररूप, पूर्ण ‘अहं’ विमर्शात्मक जो यह ‘परावाक् शक्ति’ है जिसके गर्भ में ‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ तक वर्णात्मक समग्र शक्ति चक्र विद्यमान है वही ‘पश्यन्ती’ एवं ‘मध्यमा’ के क्रम से ग्राहक भूमिका को आभासित करता है। पूर्ण होने से इसे ‘परा’ एवं प्रत्यवमर्श द्वारा विश्व का अभिलाप करने से इसे ‘वाक्’ कहा गया है— स्पं.भू. ३