स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ४०९ (क) 'मैं विश्वमय हूँ'—विश्व मेरा विराट् प्रसार है। (ख) मैं विश्वमय के साथ उससे परे 'विश्वातीत भी हूँ' (ग) मैं पंचकृत्यकारी शिव हूँ। पूर्णाहन्ता—पूर्णाहन्ता में स्वातन्त्र्य अभिन्न रूप में रहता है—इसी स्वातन्त्र्य का नाम 'परावाक्' या 'महामातृका' है। मातृका ही प्रत्यवमर्शकारिणी शक्ति है यानी प्रकाश तभी अपने को प्रकाश रूप में पहचान पाता है जब उससे मातृका जुड़ती है। मातृका के अन्तर्लीन हो जाने से प्रकाश ही प्रकाश रहता है किन्तु वह अपने को प्रकाश कहकर पहचान नहीं सकता क्योंकि प्रत्यवमर्शन शक्ति 'मातृका' में ही रहती है। मातृका स्वरूपभूता शक्ति है। यह जो शक्ति है इसी का आश्रय लेकर ही समस्त सत्ता प्रकाशित होती है। समस्त जगत्, ईश्वर, जीव एवं ज्ञेय जड़ पदार्थ व्यष्टि एवं समष्टि रूप में मातृका से उद्भूत हैं। पूर्ण एवं अपूर्ण दोनों अहं में मातृका की ही क्रीड़ा है। पूर्ण अहं सम्पूर्णमातृकामय है आदि में अकार एवं अन्त में हकार—यह महामण्डल मातृका मण्डल है। अ = प्रकाशमान। ह = विमर्श॥ 'पूर्ण अहं' परमेश्वर का नित्यसिद्ध निजस्वरूप है। पूर्ण अहं एक एवं अभिन्न हैं। 'पूर्णअहं' चैतन्यस्वरूप है इसमें इदन्ता नहीं इसमें केवल अहंता ही है। 'इदन्ता' स्वातन्त्र्यबल से सृष्टिमुख में आविर्भूत होती है। उस सृष्टि का नाम है 'महासृष्टि'। जो कुछ है—था—या होगा—सभी नित्य वर्तमान रूप में उस 'महासृष्टि' में स्थित है। वहाँ काल नहीं है। उसमें अतीत, अनागत एवं वर्तमान कुछ भी नहीं है। जिस किसी समय में, जहाँ कहीं भी कुछ था—या होगा—'महासृष्टि' में वह विद्यमान है किन्तु यह अवस्था पूर्णावस्था नहीं प्रत्युत संकुचित अवस्था है क्योंकि वह इदरूप में भासमान है अहं रूप में नहीं। पूर्णअहं—महासृष्टि। महासृष्टि का संहार = महासंहार॥ काल के हिसाब से यह अकल्पनीय है। इसका अवसान होता है—पूर्णाहंतावबोध के साथ-साथ क्योंकि उस समय इदंभाव नहीं रहता। इसे ही पूर्णतालाभ, परमेश्वरत्व, परमशिवभाव कहते हैं। यह पूर्णसत्ता वेदान्त का ब्रह्म नहीं है क्योंकि ब्रह्म—अहंभाव वर्णित है—किन्तु पूर्णाहन्ता में अहंभाव का पूर्णत्व है। महाशक्ति का सर्वात्मना परमशिव के साथ सामरस्यभाव—इस अवस्था की विशिष्टता है। 'विश्वाहंता' अहंता का सर्वोच्च शिखर है—उच्चता की परा काष्ठा है—सिद्धि एवं उपलब्धि का 'एवरेस्ट' है। 'चक्रेश्वरत्व' पूर्णता का वैभवात्मक पक्ष है और 'विश्वाहन्ता' आत्मविस्तार, चैतन्य-प्रसार एवं आत्मपरामर्श का उच्चतम शिखर है। 'चक्रेश्वरत्व' एवं 'पूर्णाहन्ता' दोनों प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्दशास्त्र में प्रतिपादित है। विश्वाहंताः समस्त विश्व के साथ अहंभाव है। (१) विहाय निजदेहास्थां सर्वत्रास्मीति भावयन्। (दृढ़ेन मनसा दृष्ट्या नान्येक्षिण्या सुखी भवेत् ॥) ॥ १०२ ॥