स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ४१३ परमेश्वर गुरुमूर्ति में प्रवेश करके अपने अनुग्राह्यों को स्वप्रत्यभिज्ञापन द्वारा उपदेश देता है—'परमेश्वरो हि गुरुमूर्तिमाविश्य अनुग्राह्यान् स्वप्रत्यभिज्ञापनेन प्रबोधयति ।।' ताम् = उसको । उस । जिसके स्वरूप का प्रतिपादन करना अशक्य है ऐसी उस, हृदय में स्फुरित वाणी को । गुरुभारतीं वन्दे = गुरु वसुगुप्त के सिद्धमुख से निःसृत समस्त रहस्योपनिषद्भूत स्पन्दतत्त्वामृतनिष्यन्दरूपा वाणी को नमन करता हूँ—स्तुति करता हूँ । वह वाणी है कैसी ? अगाध = जिसका गाध (विश्रान्ति भूमिका) अविद्यमान हो । संशय = तत्त्व की अप्राप्ति रूप विभ्रमः 'संशयः तत्त्वाप्रतिपत्तिरूपो विभ्रमः ।।' अम्भोधि = समुद्र । यह संशयपूर्ण विभ्रम दुर्जरकल्पोर्मि जाल संकुलत्व से परिपूर्ण है । समुत्तरणे = सम्यक् विलङ्घन । तारिणीम् = नावम् । संसार सागर से पार करने वाली नौका । विचित्रार्थपदां = अत्यद्भुत अभिधेय (विचित्रार्थ) वस्तु जिसमें ऐसे पदों वाली । चित्रां = विचित्र । घटनाविशेषशाली होने के कारण विस्मयाधायी ।। विचित्र एवं चित्र—दोनों शब्दों का एक साथ प्रयोग शब्दगत एवं अर्थगत वैचित्र्य का संसूचक है । सकल लोकाशय निर्विषय लोकोत्तर प्रबुद्ध हृदय संवादी विचित्रार्थ पदों के अर्थ का प्रतिपादन करने वाली चित्रा पदवाक्य रचना । वृत्तिकार ने कहा है—'अगाधो हि अप्रतिष्ठोऽनन्तः ।।' १ यद्यपि तिरपनवीं कारिका भट्टकल्लट एवं रामकण्ठ की 'वृत्ति' एवं 'विवृति' में नहीं है किन्तु उत्पलाचार्य की 'स्पन्दप्रदीपिका' में है । भट्टकल्लट ने इस पर कोई व्याख्या भी नहीं की । उत्पलदेवाचार्य ने स्पन्दप्रदीपिका के अन्त में संभवतः 'रहस्य' शब्द को दृष्टि में रखकर इसे अपायों को अदेय कहा है क्योंकि यह 'ब्रह्मविद्या बीज' है—'इदं च ब्रह्म- विद्याबीजं नाऽपरीक्षाऽस्थाने वपेत्' उक्तञ्च— गुणैरुपैताऽपि तु सिद्धविद्या कन्येव दत्ता गुणवर्जिताय । संभोगहीना विदधात्यकीर्तिं दातुर्यतस्तत्प्रगुणाय दद्यात् ॥ इत्यविद्यातमःस्थानां दर्शनाय प्रकाशिता । सतां सुपर्णा देशेव शुद्धामल गुणोज्ज्वला ॥ २ वागलुण्ठनार्थमन्येषां विद्वन्मन्यताऽपि तु । शुद्धबोधोल्लासवशात् कृता स्पन्दप्रदीपिका ॥ ३ 'अगाधसंशयाम्भोधि' = अगाध = 'अविद्यमानो गाधो विश्रान्ति भूमिका यत्र' (रामकण्ठाचार्य) संशय = तत्त्वाप्रतिपत्तिरूपो विभ्रमः । दुर्जर विकल्पोर्मिजालसंकुल होने से अम्भोधि १. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दविवृति' । २-३. स्पन्दप्रदीपिका ।