भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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परिचय एवं पृष्ठभूमि ६७ ग्राह्य ग्राहक चिद्व्याप्तित्यागाक्षेपवेशनैः । करणं सप्तधा प्राहुरभ्यासं बोधपूर्वकम् ॥ (तन्त्र० आ०५) शाक्तोपाय = ज्ञान-प्राधान्य ॥ आणवोपाय = क्रिया-प्रधान 'ज्ञान' → १. परज्ञान (सूक्ष्म) : (इच्छा शक्तिप्रधान) 'शांभव ज्ञान'—वैकल्पिक स्थूल, 'शाक्त' एवं 'आणव ज्ञान' । मलों की क्षीणता के तारतम्यानुसार ही आत्माओं की भगवद्रूपता होती है । शक्तिपात—१. तीव्र-तीव्र २. तीव्र-मध्य ३. तीव्र-मन्द ४. मध्यतीव्र ५. मध्य- मध्य ६. मध्य-मन्द ७. मन्द-तीव्र ८. मन्द-मध्य ९. मन्द-मन्द ॥ वर्ण— 'उक्तो य एष उच्चारस्तत्र योऽसौ स्फुरन् स्थितः । अव्यक्तानुकृतिप्रायो ध्वनिर्वर्णः स कथ्यते' ॥ (तन्त्रा०आ०५।१३१-१३२) क्रियोपाय → ज्ञानोपाय → इच्छोपाय → अनुपाय' ॥ —उपायत्रय 'तन्त्रालोक' में कहा गया है कि 'अज्ञान' संसृति का कारण एवं 'ज्ञान' मोक्ष का कारण हैं— 'इह तावत्समस्तेषु शास्त्रेषु परिमीयते । अज्ञानं संसृते हेतुर्ज्ञानं मोक्षैककारणम् ॥ (तन्त्रा०१।२२) मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् । १ इति प्रोक्तं तथा च श्रीमालिनीविजयोत्तरे ॥ (तन्त्रा०१।२३) आणवमल (अज्ञान) के दो रूप हैं । इसके द्वारा स्वरूप का बोध क्षीण हो जाता है । आणवमल के भेद । २ ┌─────────────────┬─────────────────┐ स्वात्मस्वातंत्र्य का बोध के स्वातंत्र्य की हानि होती है बोध नहीं होता क्योंकि संकोच-प्राधान्य रहता है । 'अज्ञान' का स्वरूप क्या है ? संसारांकुर कारण 'मायीय मल' = जिसमें वेद्य की भिन्नता की प्रतीति प्रमुख होता है । 'कार्ममल' = जिसके द्वारा संसार अंकुरित होता है—ये दोनों संसारांकुर के कारण हैं । कर्म का निमित्त भी 'मल' ही होता है— 'मलं कर्मनिमित्तं तु नैमित्तिकमतः परम्' ॥ अज्ञान के दो रूप हैं—१. पौरुष अज्ञान, २. बौद्ध अज्ञान । ३ यहाँ पौरुष अज्ञान ही विवक्षित है । पौरुष ज्ञान—मोक्ष ॥ बौद्ध अज्ञान = दुष्टाध्यवसायरूप ॥ यह कर्म का कारण नहीं है । यह कर्म ही १. उच्चारणे च प्राणाद्या व्यानान्ताः पंचवृत्तयः । आद्या तु प्राणनाभिख्या परोच्चारात्मिका भवेत् ॥ —तंत्रालोक आ० ४ २-३. तन्त्रालोक ।