स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 70, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ६९ (तन्त्रालोक १।२६-२७) 'ज्ञानमेव तदज्ञानं शिवसूत्रेषु भाषितम् ॥' 'ज्ञानं बंधः अज्ञानं बंधः ।' 'अज्ञानशब्दस्य अपूर्णज्ञानाभिधानलक्षणः' 'द्वैतप्रथा तदज्ञानं तुच्छत्वात् बंध उच्यते' (तन्त्रालोक) ।¹ १. संविद्द्वैतात्मनः पूर्णस्य रूपस्य अख्यानात् 'द्वैतप्रथा' एवं 'अज्ञानम्' ।² २. अपूर्ण ज्ञानमपूर्णत्वाच्च तदेव अपूर्णमन्यता शुभाशुभ वासना शरीर-भुवनाकार स्वभावविविध संकुचितज्ञानरूपतया मलत्रयात्मा 'बंध' इति उच्यते ।³ ३. 'मलं कर्म च मायीय आणवमखिलं च यत् ।'⁴ ४. नन्वत्र द्वैतप्रथात्मकत्वादपूर्ण ज्ञानमेव 'अज्ञानम्' । ५. स्वातंत्र्य के अतिरिक्त तुच्छ एवं अतुच्छ रूप कोई अन्य मोक्ष नहीं है । (क) यदि तुच्छ मोक्ष है तो बंध है ।⁵ (ख) यदि अतुच्छ है तो पारमार्थिक होने के कारण स्वतन्त्रात्मा मोक्ष ही है ।⁶ क) स्वतन्त्रात्मातिरिक्तस्तु तुच्छोऽतुच्छोऽपि कश्चन । न मोक्षो नाम तन्नास्य पृथङ्नामापि गृह्यते ॥ (१।३१) ख) मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूप प्रथनं हि सः ।⁷ स्वरूपं चात्मनः संवित् ॥ ग) यत्तु ज्ञेयसतत्त्वस्य पूर्णपूर्णप्रथात्मकम् । यदुत्तरोत्तरं ज्ञानं तत्तत्संसारशान्तिदम् ॥ (१।३२) मोक्ष = स्वरूप प्रथन ॥ आत्मा = संविद्रूप ॥⁸ आत्मा एवं मोक्ष दोनों के एक लक्षण हैं— 'इह तावदात्मज्ञानं मोक्ष' 'यदेवात्मनोलक्षणस्तदेव मोक्षस्य ।' योगाचार— रागादिकलुशं चित्तं संसारस्तद्विमुक्तता । संक्षेपात्कथितो मोक्षः प्रहीनावरणैर्जिनैः ॥⁹ रागादि—कलुषित चित्त = 'संसार' है और उनसे विमुक्ति ही मोक्ष है । चित्त मल का आश्रय है । मल आगन्तुक है । मलों का क्षय—स्वतः प्रभास्वरता ॥ शैव इस मत को नहीं मानते ॥ सांख्य—सुखदुःखों आदि द्वन्द्वों से शून्य पौरुष ज्ञान ही मोक्ष है । अध्वा—बंधन ॥ पूर्णज्ञान—मुक्ति ॥१० 'ज्ञान'—अज्ञान अवच्छेदात्मक है । संकोच प्रवर्धक है । इदन्ता का परामर्श देता है । ज्ञान-अज्ञान के भेद—१. पौरुष ज्ञान, २. बौद्ध ज्ञान, १. पौरुष अज्ञान, २. बौद्ध अज्ञान । पुरुष का अज्ञान = 'मल' । शिव—मल ।¹¹ १-११. तन्त्रालोक—विवेक ।