भारतकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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परिचय एवं पृष्ठभूमि ८१ २. नाहमनात्मा पश्चात्कोऽहं योऽहं पदस्थ आत्मा साक्षी । सोऽहं तत्पति शिवदासोऽहं दासोऽहमिति चरेदुपरि ॥ (८।८५)१ —वातूलोत्तरतन्त्र शिवानुभवसूत्र ‘विज्ञानभैरव’ में कहा गया है कि भक्ति के उद्वेक से विरक्त मल के हृदय में जिस प्रकार की मानसिक दशा (मति) उत्पन्न होती है वही ‘शांकरीशक्ति’ है और ऐसा साधक ‘शिव’ हो जाता है । भक्त्युद्रेकाद्विरक्तस्य यादृशी जायते मतिः । सा शक्तिः शांकरी नित्यं भावयेत् तां ततः शिवः ॥ (विज्ञानभैरव ११८) ‘गीतानिष्यन्द’ में क्षेमेन्द्र ने कहा है कि—सर्वत्र सर्वव्यापक भगवान् के श्रीचरणों में साष्टांग प्रणाम करना ही भक्ति नहीं है प्रत्युत् यथार्थ भक्ति तो यह है कि भाव स्वभाव के सभी पदार्थों में एक ही भगवान् का अनुचिन्तन किया जाय । समस्त जगत् को भगवन्मय समझा जाय । न पादपतनं भक्तिर्व्यापिनः परमेशितुः । भक्तिर्भावस्वभावानां वदेकीभावभावनम् ॥ उत्पलदेवाचार्य (‘श्री शिवस्तोत्रावली’ के पञ्चम स्तोत्र में) कहते हैं ‘हे भगवन् । आपके अद्वयानन्द को प्राप्त करके और इस जगत् को अपनी ही आत्मा की झलक से युक्त देखते हुए भी मैं भक्तिरस के चमत्कारों से वंचित न रहूँ— ‘अपि लब्धभवद्भावः स्वात्मोल्लासमयः जगत् । पश्यन् भक्तिरसाभोगैर्गर्भवेयमवियोजितः ॥ १६ ॥ आचार्य उत्पलदेव पुनः कहते हैं—‘शिव बनकर शिव की पूजा करनी चाहिए— ऐसा भक्त जनों से कहा जाता है क्योंकि पारमार्थिक सारभूत स्वरूप वाले आप भक्तों द्वारा ही अभेद दृष्टि से ढूँढ़े जाते हैं— ‘शिवा भूत्वा यजेतेति भक्तो भूत्वेति कथ्यते । त्वमेव हि वपुः सारं भक्तैर्हृदयशोधितम् ॥ (१।१४) ‘हे पूर्णाहन्ता स्वरूप स्वामी ! मैं ईश्वर हूँ’ मैं ही सुन्दर (चिदात्मा के प्रकाश से उज्ज्वल) हूँ । मैं ही सौभाग्यवान् हूँ । ज्यादा क्या कहूँ ? ‘इस जगत् में मेरे समान अन्य कौन है ?’—ऐसे स्वात्माभिमान की भावना आपके भक्त को अत्यन्त शोभा देती है— ईश्वरोऽहमेव रूपवान् पण्डितोऽस्मि सुभगोऽस्मि कोऽपरः । मत्समोऽस्ति जगतीति शोभते, मानिता त्वदनुरागिणः परम् ॥ ४ ॥ यहाँ समावेशमयी भक्ति स्पृहणीय है— ‘हे उमापति! अथाह, निर्विकल्प, अभेदरूप स्वात्मस्वरूप और सभी भेदमय १. अनुभवसूत्र । स्पं.भू. ५