श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८ ) "निर्विशेष सत् ही एक मात्र प्रत्यक्ष प्रमाण ग्राह्य है ? यदि उक्त बात ही सही होती, कि समस्त जगत में विभिन्नताओं की प्रतीति का अभाव तथा एक मात्र सत् की ही प्रतीति होती, तो जगत् संबंधी सारी प्रतीतियाँ एक ही प्रकार की होतीं, सभी में सदा प्रवाहमय एक सी ही प्रतीति होनी रहती तथा सभी पदार्थों में एक सा ही व्यवहार होता रहता [सो तो है नहीं अतः उक्त कथन निराधार है] । ' सत्यम्; तथैवात्र विविच्यते । कथम् ? घटोऽस्तीत्यत्र अस्तित्वं तद्- भेदश्च व्यवह्रियते; न द्वयोरपि व्यवहारयोः प्रत्यक्षमूलत्वम् संभवति तयोः भिन्नकालज्ञानफलत्वात्, प्रत्यक्षज्ञानस्य चैकक्षणवर्त्तित्वात् तत्र स्वरूपं वा भेदो वा प्रत्यक्षस्य विषय इति विवेचनीयम् । भेद- ग्रहणस्य स्वरूपग्रहणतत्प्रतियोगिस्मरणसापेक्षत्वादेव स्वरूप विषय- त्वमवश्यामाश्रयणीयमिति । न भेदः प्रत्यक्षेण गृह्यते, अतो भ्रान्तिमूल एव भेदव्यवहारः । (उक्त आपत्ति का निराकरण) ठीक है, आपकी शंकानुसार हम यहाँ उक्त विचार का विवेचन करते हैं। मैं पूछता हूँ कि "घट है" इस प्रतीत में उस वस्तु के अस्तित्व और उस वस्तु की अन्य वस्तु से भिन्नता का व्यवहार किस आधार पर करते हो ? दो वस्तुओं का एककालिक व्यवहार प्रत्यक्ष मूलक तो हो नहीं सकता (अर्थात् दो वस्तुएं एक साथ ही देख कर समझी नहीं जा सकतीं) क्योंकि प्रत्यक्ष ज्ञान एक क्षण में एक ही वस्तु का संभव है तथा दो वस्तुओं की भिन्न काल में ही प्रतीति होती है। इसलिए वस्तु का स्वरूप या भेद प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय है या नहीं ; यह विवेचन का विषय है। वस्तु की स्वरूपानुभूति और जिस वस्तु से उसका भेद करना है, ऐसी प्रतियोगी वस्तु को भूल जाने के बाद तो कभी भेद निर्धारण किया नहीं जा सकता, इसलिए वस्तु के स्वरूप को ही केवल प्रत्यक्ष प्रमाण का विषय मानना चाहिए, भेद को नहीं, क्योंकि भेद की प्रत्यक्ष प्रतीति तो होती नहीं ; इससे सिद्ध होता है कि भेद का व्यवहार भ्रान्ति मूलक ही है। किंच-भेदो नाम कश्चित् पदार्थों न्यायविद्भिर्निरूपयितुं न शक्यते । भेदस्तावन्न वस्तुस्वरूपम्, वस्तुस्वरूपे गृहीते स्वरूपव्यवहारं