श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 117, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५५ ) इयांस्तु विशेषः पृथक्स्थिति प्रतिपत्तियोग्या दंडादयः, गोत्वादयस्तु नियमेन तदनर्हाः इति । अतो वस्तु विरोधः प्रतीतिपराहत एव प्रतीतिप्रकार निह्नवोच्यते । प्रतीतिप्रकारो हि इदमित्थं इत्येव सर्व सम्मतः । तदेत्सूत्रकारेण “नैकस्मिन्न संभवात्” इति सुव्यक्त- मुपपादितम् । अतः प्रत्यक्षस्य सविशेषविषयत्वेन प्रत्यक्षादि दृष्ट संबंधविशिष्टविषयत्त्वादनुमानमपि सविशेषविषयमेव । प्रमाण- संख्याविवादेऽपि सर्वाभ्युपगत प्रमाणानामयमेव विषय न केनापि प्रमाणेन निर्विशेष वस्तुसिद्धिः । वस्तुगतस्वभावविशेषैस्तदेव वस्तु निर्विशेषमिति वदन् जननीवंध्यात्व प्रतिज्ञायामिव स्ववाग्विरोध- मपि न जानाति । जो लोग सब जगह भेदाभेद संबंध मानते हैं, उक्त विचार के आधार पर, वह मत भी परास्त हो जाता है । “इदं-इत्थं” इस प्रकार की प्रतीति में “इदं और इत्थं” इन दो भावों की एकता कैसे कही जा सकती है ? सास्नादि संस्थान विशेष “इत्थं” पद वाच्य तथा उससे अविशिष्ट द्रव्य “इदं” पद वाच्य है, इन दोनों की ऐक्य प्रतीति असंभव ही है। जब वस्तु की प्राथमिक प्रतीति होती है, वह सबसे विलक्षण होती है। गोत्वादि संस्थान विशेष विशिष्टता ही विलक्षणता का कारण है जो कि “इत्थं” रूप से प्रतीत होती है। सब जगह विशेषणविशेष्य भाव की प्रतिपत्ति में, विशेषणविशेष्य के अत्यन्त भेद की सुस्पष्ट प्रतीति होती है। दंड कुंडल आदि, पृथक संस्थान संस्थित और स्वनिष्ठ आकृतियाँ हैं, कभी कहीं दूसरे द्रव्य के विशेषण के रूप से भी स्थित रहती हैं। तथा गोत्व आदि द्रव्य संस्थान, पदार्थ भूत होकर उसी द्रव्य के विशेषण रूप से स्थित रहते हैं। दोनों ही जगह विशेषणविशेष्य भाव समान है तथा उसी प्रकार विशेषणविशेष्य भाव की भेद प्रतीति भी समान है विशेषता केवल इतनी ही है कि-दंड कुंडल आदि पृथक् पृथक् संस्थान संस्थित होने से, प्रतिपत्ति करने योग्य हैं गोत्व आदि एक संस्थान में नियमित होने से, प्रतिपत्ति योग्य नहीं है। इसलिए वस्तु की भिन्नता की बात, परास्त हो जाती है; प्रतीति का प्रकार जरा छिपा कर ankurnagpal108@gmail.com