श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ कि- "यथा सोम्येकेन मृत्पिण्डेन विज्ञातेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं भवति" इत्यादि । संसार का कारण संसार के सदृश ही होना चाहिए यह स्वतः सिद्ध है । कारण ब्रह्म और कार्यब्रह्म समान हैं, कारण ही कार्य बन जाता है, अन्तर केवल इतना ही है कि कारण को हम योगजन्य ज्ञान से ही देख सकते हैं जब कि कार्य को इन नेत्रों से ही देखते हैं । कारणरूप ब्रह्म अव्यक्त जड़ प्रकृति अव्यक्त चैतन्य और ईश्वर इन तीनों की समष्टि है । यहाँ अगोचर सूक्ष्म ब्रह्म कार्यरूप स्थूल ब्रह्म बन जाता है । अतः तत्त्वतः कारण और कार्य ब्रह्म में कोई भेद नहीं है । जड़ और चेतन शरीरी ब्रह्म में संसारी पदार्थों की तरह "अस्ति, जायते, वर्द्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, नश्यति" आदि परिवर्तन नहीं होते, श्रुतियों में ब्रह्म को अविकार्य बतलाया गया है । जैसे कि बच्चा जन्म लेकर क्रमशः यौवन प्रौढ़ता और वार्धक्य को प्राप्त होता है किन्तु ये सारी अवस्थायें शरीर की ही होती हे आत्मा की नहीं वैसे ही कारण ब्रह्म जब कार्य रूप में परिणत होता है तो उसमे भी विकार नहीं होता, प्रकृति बदलती है तथा आत्मा का ज्ञानस्वरूप बदल जाता है, यद्यपि वह तत्त्वतः सदा एक सा रहता है । ब्रह्म की विविध नामरूपात्मक जगद् रूप परिणति में जो परिवर्तन होता भी है वह समस्त स्थूल शरीरों में अनुप्रविष्ट होने की इच्छा से होती है अतः उसे किसी भी दृष्टि से विकार नहीं कह सकते । एकता ही ईश्वर का स्वरूप है, जड़ प्रकृति और चेतन आत्मा, उसका शरीर है अतः जगत सत्य है और अद्वैत भी सत्य है । ब्रह्माद्वैत का तात्पर्य है कि इसकी बराबरी का कोई नहीं है । संसार ब्रह्म से ओत-प्रोत है अतः ब्रह्माद्वैत कहने का यह तात्पर्य कदापि नहीं हो सकता कि जगत है ही नहीं । श्रुतियों में इसी लिए अनेक स्थलों पर आत्मा और ब्रह्म की भिन्नता का स्पष्ट उल्लेख है और एकता का भी । केवलाद्वैत मतानुसार अभेद प्रतिपादक श्रुति ही सही और प्रामाणिक है तथा भेद प्रतिपादक श्रुति काल्पनिक और मिथ्या हैं । किन्तु वैष्णव मतावलम्बियों के मत में दोनों ही प्रकार की श्रुतियाँ सही और प्रामाणिक हैं । इनका कथन है कि जैसे मनुष्य को एक कहते हुए भी आत्मा और शरीर के रूप में भिन्न माना जाता है वैसे ही ब्रह्म, जड़ प्रकृति और चेतन आत्मा से भिन्न होते हुए भी एक है । श्रीरामानुज के मत में अभेद प्रतिपादक श्रुति एक में तीन का वर्णन करती है तथा भेद प्रतिपादक श्रुति तीनों का भिन्न-भिन्न वर्णन करती हैं । इस प्रकार दोनों ही प्रामाणिक हैं । इसी प्रकार सगुण और निर्गुण प्रतिपादक श्रुतियों का भी तात्पर्य है देखने में तो ये परस्पर ankurnagpal108@gmail.com