श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७२ ) अपि च—संवित् सिद्ध्यति वा न वा ? सिद्ध्यति चेत् सधर्मता स्यात् । न चेत्तुच्छता गगनकुसुमादिवत् । सिद्धिरेव संविदिति चेत्, कस्य कं प्रति वक्तव्यम्, यदि न कस्यचित् कंचित् प्रति सा तर्हि न सिद्धिः । सिद्धिर्हि पुत्रत्वमिव कस्यचित् कंचित् प्रति भवति । आत्मनि इति चेत्, कोऽयमात्मा ? ननु संविदेत्युक्तम् । सत्यमुक्तम् दुरुक्तंतत् । तथाहि, कस्यचित् पुरुषस्य किंचिदर्थजातं प्रति सिद्धिरूपतया तत्संबंधिनी सा संवित् स्वयं कथमिवात्मभाव- मनुभवेत् ? एतदुक्तं भवति, अनुभूतिरिति स्वाश्रयं प्रति स्वसद्भावेनैव कस्यचित् वस्तुनोव्यवहारानुगुण्यापादनस्वभावो ज्ञानावगति संवि- दाद्यपरनामा सकर्मकोऽनुभवितुरात्मनो धर्मविशेषो, घटमहं जानामीममर्थमवगच्छामि पटमहं संवेद्मीति सर्वेषामात्मसाक्षिकः प्रसिद्धः । एतत् स्वभावतया हि तस्याः स्वयंप्रकाशता भवताप्युप- पादिता । अस्यसकर्मकस्य कर्तृधर्मविशेषस्य कर्मत्ववत् कर्तृत्वमपि दुर्घटमिति । वह संवित् प्रमाण द्वारा सिद्ध होती है या नही ? यदि होती है, तो वह सधर्मा है । यदि नहीं तो वह गगन कुसुम आदि की तरह तुच्छ काल्पनिक वस्तु है । यदि कहो कि सिद्धि ही संवित् है, तो किसके प्रति किसकी सिद्धि है ? यदि वह किसी के प्रति नहीं है, तो वह सिद्धि नहीं है । सिद्धि तो पुत्रता की तरह, किसी की किसी के प्रति होती हैं । यदि कहो कि आत्मा में होती है, तो बतलाओ उस आत्मा का क्या स्वरूप है ? यदि कहो कि सिद्धि ही संवित् का आत्मा है, तो ठीक ही कहा, उसी बात को पुनः दोहरा दिया । जरा विचारो तो, किसी पुरुष की किसी विषय की सिद्धि रूप, उससे सबंधिनी वह अनुभूति, स्वयं अपने भाव का अनुभव कैसे कर सकेगी ? कथन यह है कि—अनुभूति अपने सद्भाव से अपनी आश्रित किसी वस्तु को व्यवहार योग्य कर देती है । ज्ञान, अवगति, संवित् आदि सब उसी के दूसरे नाम हैं, वह बिना कर्म के स्थिर नहीं रहती, इसलिए वह सकर्मक है, अनुभव कर्त्ता आत्मा का धर्म ankurnagpal108@gmail.com