श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७४ ) अहमेवेदं, पूर्वमप्यन्वभूवमिति । भवतोऽप्यनुभूतेर्नहि अनुभवि- तृत्वमिष्टम् अनुभूतिरनुभूतिमात्रमेव । संविन्नाम काचिन्निराश्रया निर्विषया वा अत्यंतानुलब्धेर्न संभवतीत्युक्तम् । उभयाभ्युपेता संविदेवात्मेत्युपलब्धि पराहतम् । अनुभूतिमात्रमेव परमार्थ इति निष्कर्षंक हेत्वाभासाश्च निराकृताः । अनुभूति को आत्मा मानकर उसकी नित्यता हो भी जाय फिर भी उसमें प्रत्यभिज्ञा की असंभावना तो बनी ही रहेगी । प्रत्यभिज्ञा, अनुभव करने वाले की, पूर्व पर कालीन उपस्थिति बतलाती है; केवल अनुभूति की ही स्थिति नही बतलाती । “मैंने इसे पहिले भी जाना था” ऐसी अनुभूति को अनुभविता कहना तो संभव; आपको भी अभिप्रेत न होगा; अनुभूति केवल अनुभूति ही है । निराश्रय और निर्विषय संवित् कभी संभव नही है, उसकी ऐकांतिक उपलब्धि नही होती । “आश्रय और विषय युक्त संविद ही आत्मा है” ऐसा सिद्धान्त प्रतीति सिद्ध भेदानुभव द्वारा पराभूत हो गया तथा “अनुभूति मात्र ही परमार्थ है” इस मत की स्थापना में उपस्थित किये जाने वाले गलत तर्क भी निराकृत हो गए । ननु च—अहंजानामीत्यस्यस्मत्प्रत्यये योऽनिदमंशः प्रकाशैकरसः चित् पदार्थः स आत्मा । तस्मिन् तद्बलनिर्भासिततया युष्मदर्थलक्ष- णोऽहं जानामीति सिद्धयन्नहमर्थः चिन्मात्रातिरेकी युष्मदर्थ एव । नैतदेवं, अहंजानामि इति धर्मधर्मितया प्रत्यक्ष प्रतीति विरोधादेव । (वाद) “मैं जानता हूँ” इस कथन में जो “अहं” रूप चैतन्यांश प्रकाशैकरस पदार्थ है वही आत्मा है।” मैं जानता हूँ “इस प्रतीति में जो अर्थ निहित है वह, उस चैतन्य आत्मा द्वारा ही समुद्भासित होता है, अतः “अहं” का तात्पर्य चिन्मात्र अखंड आत्मा ही है। (विवाद) “मै जानता हूँ” इस प्रत्यभिज्ञा में, धर्म और धर्मी की प्रत्यक्ष भिन्न प्रतीति हो रही है इसी से आपकी उक्त बात कट जाती है । ankurnagpal108@gmail.com