श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११२ ) ब्रह्म की ज्ञातृता तो सभी श्रुतियाँ बतलाती हैं।" जो सर्वज्ञ और सर्वविद है—उसने विचारा—उस देवता ने विचारा—उसने विचार किया कि लोकों की सृष्टि करूँ--जो नित्यों का नित्य चेतनों का चेतन है वह अकेला अनेकों की कामना पूर्ण करता है--ज्ञाता और अज्ञाता दो अजन्मा, ईश और अनीश हैं—ईश्वरों के ईश्वर देवताओं के परम देवता, पतियों के परम पति, उक्त भुवनेश्वर स्तवनीय देव की आराधना करते हैं—उसका कोई कार्य कारण नहीं हैं, न उससे कोई अधिक है, और न समान है, उसकी पराशक्ति स्वाभाविकी, ज्ञान, बल, क्रिया आदि अनेक प्रकार की सुनी जाती है--वह आत्मा निष्पाप अजर, अमर, अशोक, भूख-प्यास रहित, सत्यकाम, सत्य संकल्प है।" इत्यादि श्रुतियाँ ज्ञान स्वरूप ब्रह्म के स्वाभाविक ज्ञातृता आदि गुणों का प्रतिपादन करती है तथा उसे समस्त हेय गुणों से रहित बतलाती है। निर्गुण वाक्य और सगुण वाक्य के विषय की प्रतिपादिका “अपहतपाप्मत्ता से अपिपासः” तक हीन गुणों का प्रतिषेध करके "सत्यकामः सत्यसंकल्पः” से कल्याणमय गुणों का एक साथ विवेचन करती हुई श्रुति, सगुण निर्गुण वाक्यों के विरोध का अभाव बतलाती है। इससे अन्य श्रुतियाँ मिथ्या प्रतिपादिका है, ऐसी शंका नही करनी चाहिए। “भीषाऽस्माद्वातः पवते” इत्यादिना ब्रह्मगुणानारभ्य ‘ते ये शतम्’ इत्यनुक्रमेण क्षेत्रज्ञानन्दातिशयमुक्त्वा “यतोवाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्यमनसा सह आनन्दंब्रह्मणो विद्वान् "इति ब्रह्मणः कल्याणगुणानन्त्यमत्यादरेण वदतीयं श्रुतिः। इसी प्रकार--"इसके भय से वायु चलती है" इत्यादि से ब्रह्म के गुणों को प्रारम्भ करके "उससे शतगुण” इस क्रम से क्षेत्रज्ञ की आनन्दातिशयिता को बतलाकर "जिसे न पाकर वाणी मन सहित लौट कर आ जाती है, उस आनन्द ब्रह्म को जानकर” इत्यादि से ब्रह्म के कल्याणमय अनन्तगुणों का बड़े आदर के साथ उक्त श्रुति उल्लेख करती है [यह आनन्द बल्ली श्रुति की चर्चा है] "सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणाविपश्चिता" इति ब्रह्म वेदन फलमगमयद्वाक्यं परस्य विपश्चितो ब्रह्मणो गुणानन्त्यं ब्रवीति