भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 196

मेवाकार इत्युपसंहरन् देवाद्याकार भेदेनाऽत्मसु भेदमोहं परित्यजे- ताह । अन्यथा देहातिरिक्त आत्मोपदेश्य-स्वरूपे अहं त्वं सर्वमेतदा- त्म स्वरूपमिति भेदनिर्देशो न घटते । अहं त्वमादिशब्दानां उपलक्ष्येण सर्वमेतदात्मस्वरूपमित्यनेन सामानाधिकरण्यादुपलक्षणत्वमपि न संगच्छते । सोऽपि यथोपदेशमकरोदित्याह "तत्याजभेदं परमार्थं दृष्टिः" इति । कुतश्चैष निर्णय इति चेत् देहात्मविवेकविषयत्वादुप- देशस्य । तच्च "पिण्डः पृथग्यतः पुंसश्शिरः पाण्यादिलक्षणः" इतिप्रक्रमात् । "वही मै वही तुम हो" इत्यादि वाक्य में भी तत (सः) शब्द द्वारा समस्त आत्माओं की ज्ञानाकारता का निर्देश करके पुनः ज्ञानाकार उस आत्मा के साथ अहं और त्वं पद का अभेद निर्देश करते हुए उप- संहार किया गया है, इसमें देवादि आकार भेद से आत्माओ में हुई भेद भ्रान्ति को छोड़ने का उपदेश दिया गया है।