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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 696 में से

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भेदः, देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरात्मकः । यथोक्तः शौनकेनापि-- “चतुर्विधोऽपिभेदोऽयं मिथ्याज्ञाननिबन्धनः “इति । आत्मनि ज्ञान रूपे देवादिरूपविविधभेदहेतुभूतकर्माख्याऽज्ञाने परब्रह्म ध्यानेनात्यं- तिक नाशं गते सति हेत्वभावात् असन्तं परस्मात् ब्रह्मण आत्मनो देवादिरूपभेदं कः करिष्यति इत्यर्थः । “अविद्या कर्मसंज्ञाऽन्या “इति हि अत्रैवोक्तम् । उक्त तथ्य का ही विवेचन करते हुए कहते है— “विभेद जनक अज्ञान के एक दम नष्ट हो जाने पर, आत्मा ब्रह्म के असत् भेद को कौन कर सकेगा । “विभेद का तात्पर्य है ,देव पशु मनुष्य स्थावरादि विविध भेद । जैसा कि शौनक ने भी कहा है- “स्थावर आदि चार प्रकार के भेद , मिथ्या ज्ञान से होते है। “अर्थात् ज्ञान रूप आत्मा में देवादि रूप विविध भेदों के कारणरूपी कर्म नामक अज्ञान के, परब्रह्म की ध्यान रूपी उपासना से एकदम नष्ट होने पर, कारण के अभाव में परमात्मा और जीवात्मा के देवादि रूप भेद को करने वाला कौन शेष रह जाता है । यहीं पर कहा भी गया है—“कर्म नामक अविद्या भेद रूपा है”। “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि” इत्यादिना अन्तर्यामिरूपेण सर्वे- ष्यात्मतयैक्याभिधानमन्यथा “क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते, उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः “इत्यादिनिर्विरोधः । अन्तर्यामिरूपेण सर्वेषामात्मत्वं तत्रैव भगवताऽभिहितम्-“ईश्वरस्सर्वभूतानां हृद्दे- शेऽर्जुन तिष्ठति” सर्वस्य चाहं हृदिसंनिविष्ट. “इति च । “अहमा- त्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः “इति च तदेवोच्यते । भूतशब्दो- हि आत्मपर्यन्तदेहवचनः । यतः सर्वेषामयमात्मा तत एव सर्वेषा तच्छरीरतया पृथगवस्थानं प्रतिषिध्यते– ‘ न तदस्ति विनायत्स्यात् “इति, भगवद्विभूत्युपसंहारश्चायमिति तथैवाभ्युपगन्तव्यम् । तत इदमुच्यते –“यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा तत्तदेवाव- गच्छत्वं मम तेजोंऽशसंभवम् “विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो

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